भारतीय काव्यशास्त्र में ‘रस’ को काव्य की आत्मा (Soul of Poetry) स्वीकार किया गया है। आचार्य विश्वनाथ ने अपने अमर ग्रंथ ‘साहित्यदर्पण’ में काव्य का सर्वमान्य लक्षण निरूपित करते हुए लिखा है:“वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।”
(अर्थात: रसयुक्त वाक्य ही वास्तव में काव्य या कविता है।)
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कविता, नाटक, उपन्यास अथवा कथा-प्रसंग को पढ़ने, सुनने अथवा रंगमंच पर उसका अभिनय देखने से सहृदय (पाठक, श्रोता या दर्शक) के अंतःकरण में जिस अलौकिक, अनिर्वचनीय आनंद की अनुभूति होती है, साहित्य में उसी आनंदमयी स्थिति को ‘रस’ कहा जाता है।
काव्यशास्त्र में रस के प्रथम एवं प्रामाणिक निरूपक आचार्य भरतमुनि (द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व) हैं। उन्होंने अपने विश्वप्रसिद्ध ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ के छठे अध्याय में ऐतिहासिक ‘रस-सूत्र’ प्रतिपादित किया:”विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः।”
(अर्थात: विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी/संचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।)
प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UP Police SI & Constable, UP TGT/PGT, CTET, UPTET, REET, BPSC तथा UPPSC में रस के स्थायी भाव, आलंबन-उद्दीपन विभाव, कायिक/सात्त्विक अनुभाव, 33 संचारी भावों और काव्यात्मक पंक्तियों में रस की पहचान पर 3 से 5 प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं। नीचे रस के 4 अंग, 11 रसों के स्थायी भाव, पहचान के अचूक नियम, 50+ अमर काव्यात्मक उदाहरण और 10 हल प्रश्न प्रस्तुत हैं।
रस एवं स्थायी भाव: एक नज़र में (Executive Summary Table)
| क्र. सं. | रस का नाम | स्थायी भाव | रसराज / प्रमुख देवता / वर्ण | काव्यशास्त्रीय महत्व |
|---|---|---|---|---|
| 1 | शृंगार रस | रति (प्रेम / आकर्षण) | रसराज (विष्णु / श्याम वर्ण) | रसों का राजा, संयोग व वियोग दो पक्ष |
| 2 | हास्य रस | हास (हंसी / उल्लास) | प्रमथ / श्वेत वर्ण | विकृत वेशभूषा या चेष्टा से उत्पन्न |
| 3 | करुण रस | शोक (दुख / विलाप) | यम / कपोत वर्ण | प्रियजन के वियोग या अनिष्ट से उत्पन्न |
| 4 | रौद्र रस | क्रोध (आक्रोश / अमर्ष) | रुद्र / रक्त (लाल) वर्ण | शत्रु या विरोधी के अपमान से उत्पन्न |
| 5 | वीर रस | उत्साह (जोश / उमंग) | महेंद्र / हेम (स्वर्ण) वर्ण | युद्ध, धर्म, दान या दया में पराक्रम |
| 6 | भयानक रस | भय (डर / आतंक) | काल / कृष्ण (काला) वर्ण | हिंसक जीव या आपदा के दृश्य से भय |
| 7 | बीभत्स रस | जुगुप्सा (घृणा / ग्लानि) | महाकाल / नील वर्ण | दुर्गंध, रक्त, मांस व अस्थि देख घृणा |
| 8 | अद्भुत रस | विस्मय (आश्चर्य / कौतुक) | गंधर्व / पीत (पीला) वर्ण | अलौकिक व अकल्पनीय दृश्य देखकर |
| 9 | शांत रस | निर्वेद (शम / वैराग्य) | नारायण / कुंदेंदु वर्ण | भरतमुनि के 8 रसों के बाद 9वाँ रस (उद्भट) |
| 10 | वात्सल्य रस | वत्सलता (स्नेह / वात्सल्य) | बाल-गोपाल (सूरदास रस सम्राट) | 10वाँ रस (आचार्य विश्वनाथ द्वारा स्थापित) |
| 11 | भक्ति रस | भगवद्-विषयक रति (अनुराग) | इष्टदेव (रूप गोस्वामी द्वारा स्थापित) | 11वाँ रस (ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम) |
1. रस के 4 अनिवार्य अंग (Four Components of Ras)
भरतमुनि के रस-सूत्र के अनुसार रस की निष्पत्ति हेतु चार घटकों का परस्पर संयोग अनिवार्य है:
(1) स्थायी भाव (Sthayi Bhav):
सहृदय के हृदय में जो भाव जन्म से ही सुप्त (संस्कार) रूप में सदैव विद्यमान रहते हैं और अनुकूल अवसर पाकर जागृत होते हैं, उन्हें ‘स्थायी भाव’ कहते हैं।
- भरतमुनि ने 8 स्थायी भाव माने हैं, आचार्य मम्मट व उद्भट ने शांत रस जोड़कर संख्या 9 की, तथा परवर्ती आचार्यों ने वात्सल्य व भक्ति रस जोड़कर स्थायी भावों की कुल संख्या 11 स्थापित की है।
(2) विभाव (Vibhav):
जिन कारणों या परिस्थितियों से सहृदय के मन में सोए हुए स्थायी भाव जागृत (उद्बुद्ध) होते हैं, उन्हें ‘विभाव’ कहते हैं। इसके दो भेद हैं:
- आलंबन विभाव: जिसका सहारा पाकर भाव जागते हैं (जैसे: नायक-नायिका, शत्रु, शेर)। इसके दो पक्ष होते हैं —
- आश्रय: जिसके मन में भाव जागे (जैसे: राम)।
- विषय: जिसे देखकर भाव जागे (जैसे: सीता)।
- उद्दीपन विभाव: जो वातावरण या परिस्थितियां जागे हुए भाव को और अधिक तीव्र या उद्दीप्त करती हैं (जैसे: चांदनी रात, कोयल की कूक, एकांत वन, शत्रु की ललकार)।
(3) अनुभाव (Anubhav):
आलंबन और उद्दीपन के कारण आश्रय के शरीर पर जो बाह्य चेष्टाएं या शारीरिक परिवर्तन प्रकट होते हैं, उन्हें ‘अनुभाव’ कहते हैं (जैसे: क्रोध में आंखें लाल होना, भय से कांपना, पसीना छूटना)।
- अनुभाव 4 प्रकार के होते हैं: कायिक (शारीरिक चेष्टाएं), वाचिक (वाणी द्वारा), आहार्य (वेशभूषा) तथा सात्त्विक (प्राकृतिक/अनैच्छिक 8 शारीरिक लक्षण: स्तंभ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, वेपथु/कंपन, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय)।
(4) संचारी अथवा व्यभिचारी भाव (Sanchari Bhav):
जो भाव आश्रय के मन में पानी के बुलबुलों की भांति उठते और विलीन होते रहते हैं तथा स्थायी भाव को पुष्ट करके लुप्त हो जाते हैं, उन्हें ‘संचारी भाव’ कहते हैं।
- काव्यशास्त्र में संचारी भावों की कुल संख्या 33 मानी गई है (जैसे: हर्ष, गर्व, ग्लानि, लज्जा, मोह, मति, शंका, उत्सुकता आदि)। कवि देव ने 34वाँ संचारी भाव ‘छल’ माना है।
विस्तृत सामासिक व्याकरण हेतु पढ़ें: समास के भेद, परिभाषा और 50+ उदाहरण: जानें समास विग्रह के 6 नियम
2. 11 रसों के लक्षण एवं शास्त्रीय पहचान
- शृंगार रस (स्थायी भाव: रति): जहाँ नायक-नायिका के प्रेम, सौंदर्य व मिलन/विरह का वर्णन हो।
- संयोग शृंगार: मिलन का सुखद प्रसंग (जैसे: “बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाइ”).
- वियोग (विप्रलम्भ) शृंगार: विरह व बिछोह की वेदना (जैसे: “हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी, तुम्ह देखी सीता मृगनैनी”).
- हास्य रस (स्थायी भाव: हास): अनोखी वेशभूषा, विकृत वाणी या अनोखी चेष्टा देखकर उत्पन्न हंसी (जैसे: विंध्य के वासी उदासी…).
- करुण रस (स्थायी भाव: शोक): प्रियजन की मृत्यु, स्थायी वियोग या सर्वनाश से उत्पन्न आंतरिक हाहाकार (जैसे: अभी तो मुकुट बंधा था माथ…).
- रौद्र रस (स्थायी भाव: क्रोध): शत्रु, दुष्ट अथवा विरोधी द्वारा किए गए अपमान से उत्पन्न प्रतिशोध की ज्वाला (जैसे: श्री कृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे…).
- वीर रस (स्थायी भाव: उत्साह): युद्ध, दीन-दुखियों की रक्षा, धर्म-रक्षा अथवा राष्ट्रहित में पराक्रम का संचार (जैसे: बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी…).
- भयानक रस (स्थायी भाव: भय): भयंकर वस्तु, हिंसक पशु या अनिष्टकारी घटना देखकर मन में उत्पन्न कंपकंपी व डर (जैसे: एक ओर अजगरहि लखि, एक ओर मृगराय…).
- बीभत्स रस (स्थायी भाव: जुगुप्सा/घृणा): सड़े-गले शव, रक्त, मांस, मज्जा अथवा दुर्गंध देखकर उत्पन्न होने वाली घृणा (जैसे: सिर पर बैठ्यो काग, आँख दोउ खात निकारत…).
- अद्भुत रस (स्थायी भाव: विस्मय): किसी आश्चर्यजनक या अलौकिक दृश्य को देखकर दाँतों तले उँगली दबाना (जैसे: देख यशोदा शिशु के मुख में, सकल विश्व की माया…).
- शांत रस (स्थायी भाव: निर्वेद/शम): सांसारिक मोह-माया, नश्वरता और वैराग्य से उत्पन्न परम मानसिक शांति (जैसे: मन रे तन कागद का पुतला…).
- वात्सल्य रस (स्थायी भाव: वत्सलता): छोटे बालकों की बाल-सुलभ चेष्टाओं, तोतली बोली और माता-पिता के निश्छल स्नेह का प्रसंग (जैसे: जसोदा हरि पालने झुलावै…).
- भक्ति रस (स्थायी भाव: भगवद्-रति): परमात्मा, ईश्वर या आराध्य के प्रति अनन्य आत्मसमर्पण व निष्काम भक्ति (जैसे: पायो जी मैंने राम रतन धन पायो…).
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3. प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाने वाले 50+ अमर उदाहरण (Master Reference Table)
| क्र. सं. | काव्यात्मक पंक्ति (Poetic Verse) | रस का नाम | स्थायी भाव एवं पहचान सूत्र |
|---|---|---|---|
| 1 | बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाइ। सौंह करै भौंहनु हँसै, दैन कहै नटि जाइ | संयोग शृंगार | रति (राधा-कृष्ण का मधुर वार्तालाप) |
| 2 | हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी, तुम्ह देखी सीता मृगनैनी | वियोग शृंगार | रति (सीता हरण पर राम का विरह विलाप) |
| 3 | देखि रूप लोचन ललचाने, हरषे जनु निज निधि पहिचाने | संयोग शृंगार | रति (पुष्प वाटिका में राम-सीता दर्शन) |
| 4 | निसिदिन बरसत नैन हमारे, सदा रहति पावस ऋतु हम पै जब ते स्याम सिधारे | वियोग शृंगार | रति (गोपियों का कृष्ण विरह) |
| 5 | मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई | भक्ति / शृंगार | भगवद्-रति (मीराबाई का अनन्य प्रेम) |
| 6 | तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमाप्रताप, साज मिले पंद्रह मिनट घंटा भर आलाप | हास्य रस | हास (संगीतकार की हास्यास्पद दशा) |
| 7 | विंध्य के वासी उदासी तपोब्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे | हास्य रस | हास (तपस्वियों की नारी पाने की उत्कंठा) |
| 8 | शीश पर गंगा हँसै, भुजनि भुजंगा हँसै, हास ही को दंगा भयो नंगा के विवाह में | हास्य रस | हास (शिवजी की बारात का अद्भुत दृश्य) |
| 9 | बुरे समय को देखकर गंजे तू क्यों रोय, किसी भी हालत में तेरा बाल न बांका होय | हास्य रस | हास (व्यंग्यात्मक विनोद) |
| 10 | खीस काढ़ि भागे सब, लखि बंदर का रूप | हास्य रस | हास (बंदर की चेष्टाएं) |
| 11 | अभी तो मुकुट बँधा था माथ, हुए कल ही हलदी के हाथ। हाय, रुक गया यहीं संसार, बना सिंदूर अनल अंगार | करुण रस | शोक (नववधू का असामयिक वैधव्य) |
| 12 | प्रिय पति वह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है? दुख-जलनिधि-डूबी का सहारा कहाँ है? | करुण रस | शोक (अभिमन्यु वध पर उत्तरा का शोक) |
| 13 | शोक विकल सब रोवहिं रानी, रूपु सीलु बलु तेजु बखानी | करुण रस | शोक (दशरथ मरण पर रानियों का विलाप) |
| 14 | दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही | करुण रस | शोक (सूर्यकांत त्रिपाठी निराला – सरोज स्मृति) |
| 15 | हा रघुनंदन प्रान पिरीते, तुम्ह बिनु जियत बहुत दिन बीते | करुण रस | शोक (राम वियोग में दशरथ का आर्तनाद) |
| 16 | बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी | वीर रस | उत्साह (रानी लक्ष्मीबाई का शौर्य) |
| 17 | वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो, सामने पहाड़ हो कि सिंह की दहाड़ हो | वीर रस | उत्साह (द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी) |
| 18 | वह खून कहो किस मतलब का जिसमें उबाल का नाम नहीं, वह खून कहो किस मतलब का जो आ सके देश के काम नहीं | वीर रस | उत्साह (देशभक्ति का शौर्य) |
| 19 | साज चतुरंग सेन अंग में उमंग धारि, सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत हैं | वीर रस | उत्साह (कवि भूषण – छत्रपति शिवाजी) |
| 20 | राणा प्रताप के घोड़े से पड़ गया चेतक का पाला था, वह चेतक तनिक हवा से बाग हिली लेकर सवार उड़ जाता था | वीर रस | उत्साह (चेतक का अदम्य पराक्रम) |
| 21 | श्री कृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे, सब शील अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे | रौद्र रस | क्रोध (अभिमन्यु वध पर अर्जुन का आक्रोश) |
| 22 | रे नृपबालक कालबस बोलत तोहि न सँभार, धनुही सम त्रिपुरारि धनु बिदित सकल संसार | रौद्र रस | क्रोध (लक्ष्मण पर परशुराम का क्रोध) |
| 23 | माथे पर कुटिल भृकुटि छाई, नैनन महुँ रिस रकत समाई | रौद्र रस | क्रोध (अंगारों जैसी लाल आंखें) |
| 24 | अति रिस बोले बचन कठोरा, कहु जड़ जनक धनुष केहि तोरा | रौद्र रस | क्रोध (जनक सभा में परशुराम गर्जना) |
| 25 | उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उनका लगा, मानो हवा के ज़ोर से सोता हुआ सागर जगा | रौद्र रस | क्रोध (क्रोध की भीषण तीव्रता) |
| 26 | एक ओर अजगरहि लखि, एक ओर मृगराय। विकल बटोही बीच ही, परयो मूरछा खाय | भयानक रस | भय (अजगर और सिंह देखकर पथिक का डर) |
| 27 | नव कंबुकंठी विकल भई, लखि निशाचर का रूप | भयानक रस | भय (राक्षस का भयावह रूप) |
| 28 | हाहाकार हुआ क्रंदनमय, कठिन वज्र होते थे चूर | भयानक रस | भय (प्रलयंकारी युद्ध का आतंक) |
| 29 | उधर गरजती सिंधु लहरियाँ कुटिल काल के जालों सी, चली आ रही फेन उगलती फन फैलाए व्यालों सी | भयानक रस | भय (समुद्र की विकराल लहरें) |
| 30 | कांपत तन, मन में अति त्रासा, लखि विकराल काल सम पासा | भयानक रस | भय (मृत्युतुल्य संकट देखकर थरथराना) |
| 31 | सिर पर बैठ्यो काग, आँख दोउ खात निकारत। खींचत जीभहिं स्यार, अतिहि आनंद उर धारत | बीभत्स रस | जुगुप्सा (कौए व सियार द्वारा शव नोचना) |
| 32 | बहु चील नोचि ले जात तुच, मोद उपजावत मनन में | बीभत्स रस | जुगुप्सा (चील-कौवों द्वारा मांस नोचना) |
| 33 | गिद्ध जांघ को खोदि-खोदि कै मांस उपारत, स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खान बिचारत | बीभत्स रस | जुगुप्सा (कुत्तों द्वारा शव की उंगलियां चबाना) |
| 34 | विष्ठा पूय रुधिर की धारा, बहति गंध अति दुर्गंध अपारा | बीभत्स रस | जुगुप्सा (मल-मूत्र व पीप की घिनौनी दुर्गंध) |
| 35 | चरबी के लै लेप सों, घाव भरैं मतिहीन | बीभत्स रस | जुगुप्सा (चरबी का लेप) |
| 36 | देख यशोदा शिशु के मुख में, सकल विश्व की माया। क्षणभर को वह बनी अचेतन, हिल न सकी कोमल काया | अद्भुत रस | विस्मय (कृष्ण मुख में ब्रह्मांड दर्शन) |
| 37 | अखिल भुवन चर-अचर सब, हरि मुख में लखि मातु। चकित भई गद्गद बचन, विकसित दृग पुलकातु | अद्भुत रस | विस्मय (अलौकिक विस्मयकारी दृश्य) |
| 38 | बिनु पद चलै सुनै बिनु काना, कर बिनु करम करै बिधि नाना | अद्भुत रस | विस्मय (असंभव कार्य का कौतुक) |
| 39 | आगे नदिया पड़ी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार। राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार | अद्भुत रस | विस्मय (अलौकिक गति का आश्चर्य) |
| 40 | यहाँ उहाँ दुइ बालक देखा, मतिभ्रम मोर कि आन विसेखा | अद्भुत रस | विस्मय (कौशल्या को दो राम दिखाई देना) |
| 41 | मन रे तन कागद का पुतला, लागै बूँद बिनसि जाइ छिन में, गरब करै क्या इतना | शांत रस | निर्वेद (संसार की क्षणभंगुरता) |
| 42 | जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माहिं | शांत रस | निर्वेद (अहंकार समाप्ति व आत्मज्ञान) |
| 43 | कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो, श्रीरघुनाथ-कृपा-कृपालु तें संत-सुभाव गहौंगो | शांत रस | निर्वेद (तुलसीदास का वैराग्य भाव) |
| 44 | चलती चाकी देखकर, दिया कबीरा रोय। दुई पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय | शांत रस | निर्वेद (कालचक्र व नश्वरता का बोध) |
| 45 | मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै, जैसे उड़ि जहाज को पंछी फिरि जहाज पै आवै | शांत रस | निर्वेद (सांसारिक भटकाव का अंत) |
| 46 | जसोदा हरि पालने झुलावै, हलरावै दुलराइ मल्हावै, जोइ सोइ कछु गावै | वात्सल्य रस | वत्सलता (माता यशोदा की बाल लोरियां) |
| 47 | किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत, मनिमय कनक नंद कै आँगन, बिंब पकरिबै धावत | वात्सल्य रस | वत्सलता (घुटनों के बल चलते बाल कृष्ण) |
| 48 | मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी, कितनी बार मोहि दूध पियत भई यह अजहूँ है छोटी | वात्सल्य रस | वत्सलता (बाल सुलभ अबोध हठ) |
| 49 | पायो जी मैंने राम रतन धन पायो, वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरू, किरपा करि अपनायो | भक्ति रस | भगवद्-रति (मीराबाई का ईश्वरीय अनुराग) |
| 50 | उलटि नाम जपत जगु जाना, बालमीकि भए ब्रह्म समाना | भक्ति रस | भगवद्-रति (ईश्वर नाम महिमा) |
4. विगत वर्षों की प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे गए 10 हल प्रश्न (Practice MCQs)
प्रश्न 1. “रसराज” (रसों का राजा) किस रस को कहा जाता है? (UP Police SI 2021)
(A) वीर रस
(B) शृंगार रस
(C) करुण रस
(D) हास्य रस
उत्तर: (B) शृंगार रस
व्याख्या: भोजराज ने ‘सरस्वतीकंठाभरण’ में शृंगार रस को सभी रसों में सर्वाधिक व्यापक, आकर्षक और रसोत्पादक होने के कारण ‘रसराज’ या ‘पतिरस’ की संज्ञा दी है।
प्रश्न 2. भरतमुनि के अनुसार रसों की कुल संख्या कितनी है? (UPSC CSAT / RO-ARO)
(A) 8
(B) 9
(C) 10
(D) 11
उत्तर: (A) 8
व्याख्या: भरतमुनि ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में केवल 8 रसों (शांत रस को छोड़कर) का उल्लेख किया था। शांत रस को 9वें रस के रूप में आचार्य उद्भट ने प्रतिष्ठित किया।
प्रश्न 3. “शोक” किस रस का स्थायी भाव है? (CTET)
(A) रौद्र
(B) करुण
(C) भयानक
(D) बीभत्स
उत्तर: (B) करुण
व्याख्या: किसी प्रियजन के चिर-वियोग अथवा अनिष्ट होने पर हृदय में जो शोक उत्पन्न होता है, वह करुण रस का स्थायी भाव है।
प्रश्न 4. “उत्साह” स्थायी भाव से किस रस की निष्पत्ति होती है? (UP Constable)
(A) रौद्र रस
(B) वीर रस
(C) अद्भुत रस
(D) भयानक रस
उत्तर: (B) वीर रस
व्याख्या: युद्ध, दान, दया अथवा धर्म के क्षेत्र में कठिन कार्यों को करने के लिए मन में उमड़ने वाला उत्साह वीर रस को जन्म देता है।
प्रश्न 5. काव्यशास्त्र में संचारी भावों (व्यभिचारी भावों) की संख्या कितनी मानी गई है? (UP TGT Hindi)
(A) 9
(B) 11
(C) 33
(D) 49
उत्तर: (C) 33
व्याख्या: स्थायी भावों को पुष्ट करने वाले और क्षणिक रूप से उठकर विलीन होने वाले संचारी भावों की सर्वमान्य संख्या 33 है।
प्रश्न 6. “सिर पर बैठ्यो काग, आँख दोउ खात निकारत” पंक्ति में कौन सा रस है? (BPSC शिक्षक भर्ती)
(A) भयानक रस
(B) बीभत्स रस
(C) करुण रस
(D) रौद्र रस
उत्तर: (B) बीभत्स रस
व्याख्या: यहाँ मृत शरीर को कौए द्वारा नोचने का घृणास्पद वर्णन है। इसका स्थायी भाव ‘जुगुप्सा’ (घृणा) है, अतः बीभत्स रस है।
प्रश्न 7. “किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत” में कौन सा रस है? (DSSSB PRT)
(A) शृंगार रस
(B) शांत रस
(C) वात्सल्य रस
(D) हास्य रस
उत्तर: (C) वात्सल्य रस
व्याख्या: बालक कृष्ण के घुटनों के बल चलने की बाल सुलभ सुंदर चेष्टा का वर्णन होने के कारण यहाँ वात्सल्य रस है, जिसका स्थायी भाव वत्सलता (स्नेह) है।
प्रश्न 8. आलंबन और उद्दीपन विभावों के कारण आश्रय के शरीर पर होने वाले बाह्य परिवर्तनों को क्या कहते हैं? (UPPSC Staff Nurse / RO)
(A) स्थायी भाव
(B) अनुभाव
(C) संचारी भाव
(D) व्यभिचारी भाव
उत्तर: (B) अनुभाव
व्याख्या: भाव जागने के उपरांत आश्रय की शारीरिक व मानसिक चेष्टाओं को ‘अनुभाव’ कहा जाता है (जैसे अश्रु आना, कांपना, रोमांच आदि)।
प्रश्न 9. कथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए: (UPSC Pattern)
- कथन (A): “बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाइ” में संयोग शृंगार रस है।
- कारण (R): जहाँ नायक और नायिका के प्रत्यक्ष मिलन, वार्तालाप तथा प्रेम-क्रीड़ा का वर्णन हो, वहाँ संयोग शृंगार होता है।
(A) (A) और (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है।
(B) (A) और (R) दोनों सही हैं किन्तु (R), (A) सही व्याख्या नहीं है।
(C) (A) सही है परन्तु (R) गलत है।
(D) (A) गलत है परन्तु (R) सही है।
उत्तर: (A) (A) और (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है।
प्रश्न 10. सात्त्विक अनुभावों की कुल संख्या कितनी मानी गई है? (REET / TGT)
(A) 4
(B) 6
(C) 8
(D) 10
उत्तर: (C) 8
व्याख्या: बिना किसी बाह्य प्रयत्न के स्वतः उत्पन्न होने वाले सात्त्विक अनुभाव 8 हैं: स्तंभ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, वेपथु (कंपन), वैवर्ण्य, अश्रु और प्रलय।
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6. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1. रस के कुल कितने अंग (घटक) होते हैं?
उत्तर: रस के चार अनिवार्य अंग होते हैं — (1) स्थायी भाव, (2) विभाव (आलंबन व उद्दीपन), (3) अनुभाव (कायिक, वाचिक, आहार्य व सात्त्विक), और (4) संचारी भाव (संख्या 33)।
प्रश्न 2. विप्रलम्भ शृंगार और करुण रस में क्या अंतर है?
उत्तर: विप्रलम्भ (वियोग) शृंगार में नायक-नायिका के बिछोह में भविष्य में पुनः मिलने की आशा बनी रहती है (जैसे राम-सीता विरह)। जबकि करुण रस में प्रियजन की स्थायी हानि या मृत्यु हो जाती है, जहाँ पुनर्मिलन की कोई संभावना नहीं रहती (जैसे दशरथ मरण)।
प्रश्न 3. हिंदी साहित्य में कुल कितने रस स्वीकार किए गए हैं?
उत्तर: पारंपरिक रूप से 9 रस (‘नवरस’) माने जाते हैं। बाद के आचार्यों द्वारा वात्सल्य और भक्ति रस को स्वतंत्र रस की मान्यता देने के बाद हिंदी में कुल 11 रस सर्वमान्य हैं।
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