संस्कृत काव्यशास्त्र के प्राचीन आचार्यों ने काव्य के सौंदर्य और उसकी प्रभावोत्पादकता को बढ़ाने वाले तत्वों में ‘अलंकार’ को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया है। अलंकार का शाब्दिक अर्थ है — ‘आभूषण’, ‘गहना’ या ‘श्रृंगार’। जिस प्रकार कोई नारी अपने शारीरिक सौंदर्य को निखारने हेतु विविध प्रकार के स्वर्णाभूषणों को धारण करती है, ठीक उसी प्रकार कवि अपनी काव्य-रचना के भाव, भाषा और शैली को चमत्कारी व आकर्षक बनाने हेतु जिन भाषिक उपादानों का प्रयोग करता है, वे ‘अलंकार’ कहलाते हैं।
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आचार्य दण्डी ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘काव्यादर्श’ में अलंकार की सटीक परिभाषा देते हुए लिखा है:“काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते।”
(अर्थात: काव्य के शोभाकारक धर्म अथवा तत्व ही अलंकार कहलाते हैं।)
प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UPSC CSAT, UPPSC, BPSC, UP Police Sub-Inspector/Constable, REET, CTET, DSSSB और UP TGT/PGT में अलंकार से संबंधित 3 से 5 प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं। नीचे अलंकार की सैद्धांतिक व्युत्पत्ति, प्रमुख भेद (शब्दालंकार, अर्थालंकार, उभयालंकार), उनके उप-भेद, 50 से अधिक अमर काव्यात्मक उदाहरण और विगत वर्षों के 10 हल प्रश्न प्रस्तुत हैं।
अलंकार: एक नज़र में (Executive Summary Table)
| विवरण पैरामीटर (Parameter) | शास्त्रीय विवरण (Classical Specifications) |
|---|---|
| शाब्दिक अर्थ | आभूषण, गहना, श्रृंगार अथवा शोभा बढ़ाने वाला साधन |
| व्याकरणिक व्युत्पत्ति | ‘अलम्’ (पर्याप्त / शोभा) + ‘कार’ (करने वाला) |
| काव्यशास्त्र में प्रथम प्रवर्तक | आचार्य भामह (ग्रंथ: ‘काव्यालंकार’, 6वीं शताब्दी) |
| मुख्य शास्त्रीय भेद | 3 भेद: शब्दालंकार, अर्थालंकार, उभयालंकार |
| प्रमुख शब्दालंकार | अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति, पुनरुक्तिप्रकाश |
| प्रमुख अर्थालंकार | उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, भ्रान्तिमान, सन्देह, विभावना |
| उपमा के 4 अनिवार्य अंग | उपमेय, उपमान, साधारण धर्म, वाचक शब्द (सा, सी, से, सम, सरिस) |
| उभयालंकार के प्रवर्तक | आचार्य भोजराज (ग्रंथ: ‘सरस्वतीकंठाभरण’) |
| प्रमुख परीक्षा क्षेत्र | UP Police, TGT/PGT, CTET, UPTET, RO/ARO, BPSC, UPPSC |
1. अलंकार की परिभाषा एवं व्युत्पत्ति (Definition & Origin)
‘अलंकार’ शब्द दो शब्दों के योग से बना है — अलम् + कार। यहाँ ‘अलम्’ का अर्थ ‘शोभा’ अथवा ‘भूषण’ है और ‘कार’ का अर्थ ‘करने वाला’ या ‘उत्पन्न करने वाला’ है। अतः जो तत्व काव्य की शोभा बढ़ाए या उसमें रमणीयता उत्पन्न करे, उसे अलंकार कहते हैं।
- आचार्य भामह के अनुसार: “न कान्तमपि निर्भूषं विभाति वनितामुखम्।” (अर्थात: जैसे किसी सुंदरी का मुख आभूषणों के बिना शोभा नहीं देता, वैसे ही कविता भी अलंकारों के बिना रमणीय नहीं लगती।)
- आचार्य केशवदास के अनुसार (रीतिकाल):
“जदपि सुजाति सुलच्छनी, सुबरन सरस सुवृत्त।
भूषन बिनु न विराजई, कविता, बनिता, मित्त।।”
विस्तृत सामासिक व्याकरण हेतु पढ़ें: समास के भेद, परिभाषा और 50+ उदाहरण: जानें समास विग्रह के 6 नियम
2. अलंकार के प्रमुख भेद (Types of Alankar)
काव्य में चमत्कार और सौंदर्य मुख्य रूप से तीन प्रकार से उत्पन्न होता है, जिसके आधार पर अलंकार के तीन मुख्य भेद माने गए हैं:
- शब्दालंकार (Shabd Alankar): जहाँ काव्य में सौंदर्य अथवा चमत्कार विशिष्ट ‘शब्दों’ के प्रयोग के कारण उत्पन्न होता है। यदि उस शब्द के स्थान पर उसका पर्यायवाची रख दिया जाए, तो वह चमत्कार नष्ट हो जाता है।
- अर्थालंकार (Arth Alankar): जहाँ चमत्कार शब्दों पर निर्भर न होकर उनके ‘अर्थ’ पर आधारित होता है। इसमें शब्द के स्थान पर उसका पर्यायवाची रख देने पर भी अलंकार का सौंदर्य अक्षुण्ण बना रहता है।
- उभयालंकार (Ubhaya Alankar): जहाँ शब्द और अर्थ दोनों के संतुलित समन्वय से काव्य में चमत्कार उत्पन्न होता है।
कमल के 50+ पर्यायवाची शब्दों हेतु पढ़ें: कमल का पर्यायवाची शब्द: 50+ समानार्थी शब्द
3. शब्दालंकार के 5 प्रमुख भेद एवं नियम
(क) अनुप्रास अलंकार (Alliteration):
जहाँ काव्य में समान वर्णों (व्यंजनों) की बार-बार आवृत्ति हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
- छेकानुप्रास: जहाँ एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति केवल एक बार (क्रमशः दो बार आना) हो। जैसे: “बंदौ गुरु पद पदुम परागा।”
- वृत्त्यनुप्रास: जहाँ एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति दो से अधिक बार हो। जैसे: “तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।”
- लाटानुप्रास: जहाँ शब्द और अर्थ वही रहें, परन्तु अन्वय (तात्पर्य) बदलने से भिन्नता आ जाए। जैसे: “पूत कपूत तो क्यों धन संचय, पूत सपूत तो क्यों धन संचय।”
- अन्त्यानुप्रास: जहाँ चरणों के अंत में तुकांत तुकबंदी मिले। जैसे: “जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।”
- श्रुत्यानुप्रास: जहाँ एक ही उच्चारण स्थान (कंठ, तालु, दंत आदि) से उच्चरित होने वाले वर्णों की प्रधानता हो।
(ख) यमक अलंकार:
जहाँ काव्य में एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए और प्रत्येक बार उसका अर्थ भिन्न-भिन्न हो।
- उदाहरण 1: “कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। वा खाए बौराय जग, या पाए बौराय।।” (पहला कनक = धतूरा, दूसरा कनक = सोना/स्वर्ण)।
- उदाहरण 2: “काली घटा का घमंड घटा।” (पहली घटा = काले बादल, दूसरी घटा = कम होना)।
- उदाहरण 3: “जेते तुम तारे, तेते नभ में न तारे हैं।” (पहले तारे = उद्धार करना, दूसरे तारे = नक्षत्र/तारे)।
(ग) श्लेष अलंकार:
‘श्लेष’ का अर्थ है ‘चिपका हुआ’। जहाँ कविता में कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो, परन्तु प्रसंगवश उसके एक से अधिक अर्थ निकलते हों।
- उदाहरण 1: “रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।।”
(यहाँ ‘पानी’ शब्द के मोती के संदर्भ में ‘चमक’, मनुष्य के संदर्भ में ‘प्रतिष्ठा/सम्मान’ तथा चून (आटे) के संदर्भ में ‘जल’ अर्थ हैं)। - उदाहरण 2: “सुबरन को खोजत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर।”
(कवि हेतु सुबरन = सुंदर वर्ण/अक्षर, व्यभिचारी हेतु = सुंदर रूप-रंग, चोर हेतु = स्वर्ण/सोना)।
(घ) वक्रोक्ति अलंकार:
जहाँ वक्ता द्वारा कहे गए कथन का श्रोता जानबूझकर या श्लेष/काकु के कारण दूसरा अर्थ निकालता है।
- उदाहरण: “को तुम्ह हौ? इत आए कहाँ? घनस्याम हौ तौ कितहूँ बरसो।” (राधा जी कृष्ण से पूछती हैं कि तुम कौन हो? कृष्ण कहते हैं ‘मैं घनश्याम हूँ’, राधा अर्थ लगाती हैं ‘काले बादल’ और कहती हैं कि यहाँ क्या कर रहे हो, कहीं जाकर बरसो)।
(ङ) पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार:
जहाँ एक ही शब्द की आवृत्ति केवल भाव अथवा कथन को प्रभावशाली बनाने हेतु बिना अर्थ बदले हो।
- उदाहरण: “मधुर-मधुर मेरे दीपक जल।”
विलोम शब्दों के 200+ नियमों हेतु पढ़ें: Vilom Shabd in Hindi: 200+ महत्वपूर्ण विलोम शब्द
4. अर्थालंकार के प्रमुख भेद एवं शास्त्रीय पहचान
(क) उपमा अलंकार:
जहाँ किसी वस्तु या प्राणी की तुलना किसी अन्य अत्यंत प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से गुण, रूप या धर्म के आधार पर की जाए। उपमा के 4 अनिवार्य अंग होते हैं:
- उपमेय: जिसकी तुलना की जाए (जैसे: मुख)।
- उपमान: जिससे तुलना की जाए (जैसे: चंद्रमा)।
- साधारण धर्म: वह साझा गुण जिसके कारण तुलना हो (जैसे: सुंदरता)।
- वाचक शब्द: तुलना प्रकट करने वाले शब्द (सा, सी, से, सम, सरिस, सदृश, जैसा, इव)।
- पहचान ट्रिक: पंक्ति में योजक चिह्न के साथ ‘सा, सी, से’ अथवा ‘सम, सरिस’ लगा हो।
- उदाहरण: “पीपर पात सरिस मन डोला।” | “हरिपद कोमल कमल से।”
(ख) रूपक अलंकार:
जहाँ उपमेय और उपमान में अत्यधिक समानता के कारण उपमेय पर उपमान का अभेद (भेद रहित) आरोप कर दिया जाए।
- पहचान ट्रिक: उपमेय और उपमान के बीच प्रायः योजक चिह्न (-) होता है और कोई वाचक शब्द (सा/सी) नहीं होता।
- उदाहरण 1: “चरण कमल बंदौ हरिराई।” (कमल रूपी चरण)।
- उदाहरण 2: “मैया मैं तो चंद्र-खिलौना लैहों।” (चंद्रमा रूपी खिलौना)।
- उदाहरण 3: “अंबर पनघट में डुबो रही, तारा घट ऊषा नागरी।”
(ग) उत्प्रेक्षा अलंकार:
जहाँ उपमेय में उपमान की प्रबल संभावना या कल्पना की जाए।
- पहचान ट्रिक (वाचक शब्द): मनु, मानो, मनहुँ, जनु, जानो, जनहुँ, इव, ज्यों।
- उदाहरण 1: “सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमणि सैल पर, आतप पर्यो प्रभात।।”
- उदाहरण 2: “उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उनका लगा। मानो हवा के ज़ोर से सोता हुआ सागर जगा।।”
(घ) अतिशयोक्ति अलंकार:
जहाँ किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना का वर्णन लोक-मर्यादा या वास्तविकता से बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर किया जाए।
- उदाहरण 1: “हनुमान की पूँछ में लगन न पाई आगि। लंका सिगरी जल गई, गए निसाचर भागि।।”
- उदाहरण 2: “आगे नदिया पड़ी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार। राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार।।”
(ङ) अन्य महत्वपूर्ण अर्थालंकार:
- विभावना अलंकार (कारण के बिना कार्य होना): “बिनु पद चलै सुनै बिनु काना, कर बिनु करम करै बिधि नाना।”
- विशेषोक्ति अलंकार (कारण मौजूद होने पर भी कार्य न होना): “नेह न नैननि को कछू, उपजी बड़ी बलाइ। नीर भरे नित-प्रति रहैं, तऊ न प्यास बुझाइ।।”
- भ्रान्तिमान अलंकार (उपमेय को भ्रमवश उपमान समझ लेना): “नाक का मोती अधर की कांति से, बीज दाड़िम का समझकर भ्रांति से। देख उसको ही हुआ शुक मौन है, सोचता है अन्य शुक यह कौन है।।”
- सन्देह अलंकार (अनिश्चय की स्थिति अंत तक बनी रहना): “सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है। सारी ही कि नारी है कि नारी ही कि सारी है।।”
- मानवीकरण अलंकार (प्रकृति पर मानवीय चेष्टाओं का आरोप): “मेघ आए बड़े बन-ठन के संवर के।”
5. प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाने वाले 50+ अमर उदाहरण (Master Reference Table)
| क्र. सं. | काव्यात्मक पंक्ति (Poetic Verse) | अलंकार का नाम | पहचान एवं निर्णायक कारण |
|---|---|---|---|
| 1 | तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए | अनुप्रास (वृत्त्यनुप्रास) | ‘त’ वर्ण की 5 बार लगातार आवृत्ति |
| 2 | चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही हैं जल-थल में | अनुप्रास | ‘च’ वर्ण की बार-बार आवृत्ति |
| 3 | रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीताराम | अनुप्रास | ‘र’ तथा ‘प’ वर्ण की आवृत्ति |
| 4 | कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय | यमक अलंकार | कनक शब्द दो बार, अर्थ धतूरा व सोना |
| 5 | काली घटा का घमंड घटा, नभ मंडल तारक वृंद खिले | यमक अलंकार | घटा शब्द दो बार (बादल तथा कम होना) |
| 6 | तीन बेर खाती थीं वे तीन बेर खाती हैं | यमक अलंकार | बेर शब्द दो बार (तीन बार तथा बेर फल) |
| 7 | तोपर वारौं उरबसी, सुनि राधिके सुजान। तू मोहन कै उरबसी, ह्वै उरबसी समान | यमक अलंकार | उरबसी (अप्सरा, हृदय में बसी, आभूषण) |
| 8 | रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून | श्लेष अलंकार | पानी शब्द के तीन अर्थ (चमक, प्रतिष्ठा, जल) |
| 9 | सुबरन को खोजत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर | श्लेष अलंकार | सुबरन के तीन अर्थ (सुंदर अक्षर, रूप, सोना) |
| 10 | जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय | श्लेष अलंकार | बारे व बढ़े शब्द के दो-दो भिन्न अर्थ |
| 11 | पीपर पात सरिस मन डोला | उपमा अलंकार | ‘सरिस’ वाचक शब्द, मन की तुलना पीपल के पत्ते से |
| 12 | हरिपद कोमल कमल से | उपमा अलंकार | ‘से’ वाचक शब्द, ईश्वर के चरणों की कमल से तुलना |
| 13 | मुख बाल रवि सम लाल होकर ज्वाला सा हुआ बोधित | उपमा अलंकार | ‘सम’ और ‘सा’ वाचक शब्द |
| 14 | मखमल के झूले पड़े हाथी-सा टीला | उपमा अलंकार | ‘सा’ वाचक शब्द |
| 15 | नवल सुंदर श्याम शरीर की, सजल नीरद सी कल कांति थी | उपमा अलंकार | ‘सी’ वाचक शब्द |
| 16 | चरण कमल बंदौ हरिराई | रूपक अलंकार | चरणों पर कमल का अभेद आरोप |
| 17 | मैया मैं तो चंद्र-खिलौना लैहों | रूपक अलंकार | चंद्रमा पर खिलौने का अभेद आरोप |
| 18 | अंबर पनघट में डुबो रही, तारा घट ऊषा नागरी | रूपक अलंकार | अंबर-पनघट, तारा-घट, ऊषा-नागरी में अभेद |
| 19 | पायो जी मैंने राम रतन धन पायो | रूपक अलंकार | राम नाम पर रत्न धन का आरोप |
| 20 | प्रेम-अतिथि खड़ा द्वार पर, हृदय-कपाट खोल दो तुम | रूपक अलंकार | प्रेम पर अतिथि का आरोप |
| 21 | सोहत ओढ़े पीत पट स्याम सलोने गात, मनहुँ नीलमणि सैल पर आतप पर्यो प्रभात | उत्प्रेक्षा अलंकार | ‘मनहुँ’ वाचक शब्द द्वारा संभावना |
| 22 | उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उनका लगा, मानो हवा के ज़ोर से सोता हुआ सागर जगा | उत्प्रेक्षा अलंकार | ‘मानो’ वाचक शब्द द्वारा सागर की संभावना |
| 23 | सिर फट गया उसका वहीं, मानो अरुण रंग का घड़ा हो | उत्प्रेक्षा अलंकार | ‘मानो’ वाचक शब्द द्वारा लाल घड़े की कल्पना |
| 24 | दादुर धुनि चहुँ दिसा सुहाई, जनु संतकैन मन उपजाई | उत्प्रेक्षा अलंकार | ‘जनु’ वाचक शब्द |
| 25 | चमचमात चंचल नयन, बिनु घूँघट पट झीन। मानहुँ सुरसरिता बिमल, जल बिछुरत जुग मीन | उत्प्रेक्षा अलंकार | ‘मानहुँ’ वाचक शब्द |
| 26 | हनुमान की पूँछ में लगन न पाई आगि, लंका सिगरी जल गई गए निसाचर भागि | अतिशयोक्ति अलंकार | बिना आग लगे लंका जलने का अतिरंजित वर्णन |
| 27 | आगे नदिया पड़ी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार। राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार | अतिशयोक्ति अलंकार | सोचने से पहले नदी पार करने का अतिशयोक्ति वर्णन |
| 28 | देख लो साकेत नगरी है यही, स्वर्ग से मिलने गगन में जा रही | अतिशयोक्ति अलंकार | भवनों की ऊंचाई का स्वर्ग छूने का वर्णन |
| 29 | बाँधा था विधु को किसने, इन काली जंजीरों से | अतिशयोक्ति अलंकार | रूपक अतिशयोक्ति (मुख व बालों का रूपक) |
| 30 | बिनु पद चलै सुनै बिनु काना, कर बिनु करम करै बिधि नाना | विभावना अलंकार | बिना पैर चलना, बिना कान सुनना (बिना कारण कार्य) |
| 31 | निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। बिनु पानी, साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय | विभावना अलंकार | बिना पानी-साबुन स्वभाव निर्मल होना |
| 32 | नीर भरे नित-प्रति रहैं, तऊ न प्यास बुझाइ | विशेषोक्ति अलंकार | जल का भंडार होते हुए भी प्यास न बुझना |
| 33 | धनोन्माद न जिनको हुआ, प्रभुता पाकर कौन | विशेषोक्ति अलंकार | प्रभुता होने पर भी घमंड न होना |
| 34 | नाक का मोती अधर की कांति से, बीज दाड़िम का समझकर भ्रांति से | भ्रान्तिमान अलंकार | तोते द्वारा नाक के मोती को अनार दाना समझना |
| 35 | जानि स्याम को स्याम घन, नाचि उठे बन मोर | भ्रान्तिमान अलंकार | मोरों द्वारा कृष्ण को काले बादल समझकर नाचना |
| 36 | बिल विचारि प्रविशन लग्यो नाग सूंड में ब्याल, ताहु कारी ऊख भ्रम लियो उठाय उत्ताल | भ्रान्तिमान अलंकार | सांप ने हाथी की सूंड को बिल समझा, हाथी ने गन्ना समझा |
| 37 | सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है | सन्देह अलंकार | वस्त्र और स्त्री के मध्य अंत तक संदेह बना रहना |
| 38 | कैधौं व्योम बीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु | सन्देह अलंकार | पुच्छल तारे या लपटों के मध्य संशय |
| 39 | हृदय घाव मेरे पीर रघुवीरै | असंगति अलंकार | घाव लक्ष्मण के हृदय में, पीड़ा राम को |
| 40 | दृग उरझत टूटत कुटुंब, जुरत चतुर चित प्रीति | असंगति अलंकार | उलझती आंखें हैं, टूटता परिवार है |
| 41 | मेघ आए बड़े बन-ठन के संवर के | मानवीकरण अलंकार | मेघों पर शहरी दामाद जैसी मानवीय चेष्टा |
| 42 | उषा सुनहले तीर बरसती, जयलक्ष्मी-सी उदित हुई | मानवीकरण अलंकार | उषा काल पर मानवीय क्रिया का आरोप |
| 43 | फूल हँसे कलियाँ मुसकाईं | मानवीकरण अलंकार | फूलों और कलियों का इंसानों की भांति हंसना |
| 44 | जो रहीम दीपक दसा, कपूत की सोय | दृष्टांत अलंकार | बिंब-प्रतिबिंब भाव द्वारा नीति का निरूपण |
| 45 | सठ सुधरहिं सतसंगति पाई, पारस परस कुघातु सुहाई | दृष्टांत अलंकार | उपमेय-उपमान में बिंब-प्रतिबिंब भाव |
| 46 | भरतहि होई न राजमदु, बिधि हरि हर पद पाइ | उदाहरण अलंकार | उदाहरण वाचक शब्द द्वारा स्पष्टीकरण |
| 47 | सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे। बिहसे करुनाऐन, चितइ जानकी लखन तन | सोरठा / अनुप्रास | वर्णों की लयबद्ध आवृत्ति |
| 48 | मधुर-मधुर मेरे दीपक जल | पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार | शब्द की आवृत्ति केवल माधुर्य बढ़ाने हेतु |
| 49 | पुनि-पुनि मोहि दिखाव कुठारू | पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार | क्रोध और भाव की सघनता हेतु दोहराव |
| 50 | को तुम्ह? हम हैं घनस्याम। तौ कितहूँ बरसो जाई | वक्रोक्ति अलंकार | श्रोता द्वारा जानबूझकर कल्पित अर्थ लेना |
6. विगत वर्षों की प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे गए 10 हल प्रश्न (Practice MCQs)
प्रश्न 1. “चरण कमल बंदौ हरिराई” में कौन सा अलंकार है? (UP Police SI 2021)
(A) उपमा अलंकार
(B) रूपक अलंकार
(C) श्लेष अलंकार
(D) उत्प्रेक्षा अलंकार
उत्तर: (B) रूपक अलंकार
व्याख्या: यहाँ हरि (ईश्वर) के चरणों पर कमल का बिना किसी वाचक शब्द के अभेद आरोप किया गया है, अतः यहाँ रूपक अलंकार है।
प्रश्न 2. “पीपर पात सरिस मन डोला” पंक्ति में ‘मन’ क्या है? (UPSC CSAT / RO-ARO)
(A) उपमान
(B) उपमेय
(C) साधारण धर्म
(D) वाचक शब्द
उत्तर: (B) उपमेय
व्याख्या: उपमा अलंकार में जिसकी तुलना की जाती है उसे ‘उपमेय’ कहते हैं। यहाँ ‘मन’ की तुलना की जा रही है, ‘पीपर पात’ उपमान है, ‘सरिस’ वाचक शब्द है और ‘डोला’ साधारण धर्म है।
प्रश्न 3. जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना व्यक्त की जाए, वहाँ कौन सा अलंकार होता है? (UP TGT Hindi)
(A) रूपक
(B) उपमा
(C) उत्प्रेक्षा
(D) भ्रान्तिमान
उत्तर: (C) उत्प्रेक्षा
व्याख्या: जब उपमेय में उपमान की कल्पना या संभावना की जाती है, तो उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। इसके वाचक शब्द मनु, मानो, जनु, जानो आदि हैं।
प्रश्न 4. “कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय” में कौन सा अलंकार है? (BPSC शिक्षक भर्ती)
(A) यमक अलंकार
(B) श्लेष अलंकार
(C) अनुप्रास अलंकार
(D) वक्रोक्ति अलंकार
उत्तर: (A) यमक अलंकार
व्याख्या: यहाँ ‘कनक’ शब्द दो बार आया है। प्रथम कनक का अर्थ धतूरा तथा द्वितीय कनक का अर्थ स्वर्ण (सोना) है। भिन्न अर्थ होने के कारण यमक अलंकार है।
प्रश्न 5. “रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।।” रेखांकित शब्द में अलंकार है: (CTET)
(A) यमक
(B) रूपक
(C) श्लेष
(D) उपमा
उत्तर: (C) श्लेष
व्याख्या: यहाँ ‘पानी’ शब्द के तीन अर्थ (मोती के लिए चमक, मनुष्य के लिए प्रतिष्ठा/इज्जत तथा चून के लिए साधारण जल) चिपके हुए हैं, अतः श्लेष अलंकार है।
प्रश्न 6. “बिनु पद चलै सुनै बिनु काना, कर बिनु करम करै बिधि नाना” में कौन सा अलंकार है? (UP Constable)
(A) विशेषोक्ति
(B) विभावना
(C) असंगति
(D) दृष्टांत
उत्तर: (B) विभावना
व्याख्या: जहाँ बिना किसी कारण के ही कार्य की उत्पत्ति दिखाई जाए, वहाँ विभावना अलंकार होता है। यहाँ बिना पैर के चलना और बिना कान के सुनना दर्शाया गया है।
प्रश्न 7. “सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है” में कौन सा अलंकार है? (UPPSC Staff Nurse / RO)
(A) भ्रान्तिमान
(B) सन्देह
(C) रूपक
(D) उपमा
उत्तर: (B) सन्देह
व्याख्या: जहाँ उपमेय और उपमान के मध्य अंत तक संशय बना रहे और निश्चय न हो पाए, वहाँ सन्देह अलंकार होता है।
प्रश्न 8. “मेघ आए बड़े बन-ठन के संवर के” में कौन सा अलंकार प्रयुक्त हुआ है? (DSSSB PRT)
(A) उपमा
(B) रूपक
(C) मानवीकरण
(D) उत्प्रेक्षा
उत्तर: (C) मानवीकरण
व्याख्या: जब जड़ अथवा प्राकृतिक वस्तुओं पर मानवीय चेष्टाओं, भावनाओं या क्रियाकलापों का आरोप किया जाता है, तो मानवीकरण अलंकार होता है।
प्रश्न 9. कथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए: (UPSC Pattern)
- कथन (A): “तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए” में वृत्त्यनुप्रास अलंकार है।
- कारण (R): जब काव्य में एक ही वर्ण की आवृत्ति दो से अधिक बार होती है, तो वहाँ वृत्त्यनुप्रास होता है।
(A) (A) और (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है।
(B) (A) और (R) दोनों सही हैं किन्तु (R), (A) सही व्याख्या नहीं है।
(C) (A) सही है परन्तु (R) गलत है।
(D) (A) गलत है परन्तु (R) सही है।
उत्तर: (A) (A) और (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है।
व्याख्या: यहाँ ‘त’ वर्ण की आवृत्ति 5 बार हुई है, जो वृत्त्यनुप्रास का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
प्रश्न 10. “नाक का मोती अधर की कांति से, बीज दाड़िम का समझकर भ्रांति से” में कौन सा अलंकार है? (TGT/PGT)
(A) सन्देह
(B) भ्रान्तिमान
(C) रूपक
(D) अतिशयोक्ति
उत्तर: (B) भ्रान्तिमान
व्याख्या: जब सादृश्य के कारण उपमेय में उपमान का पक्का भ्रम या निश्चय हो जाए (तोते ने मोती को वास्तविक अनार का दाना समझ लिया), तो भ्रान्तिमान अलंकार होता है।
7. सामान्य हिंदी व्याकरण हेतु अनुशंसित प्रामाणिक पुस्तकें (Recommended Books)
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8. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1. यमक और श्लेष अलंकार में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: यमक अलंकार में एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आता है और हर बार उसका अर्थ अलग होता है (जैसे कनक-कनक)। जबकि श्लेष अलंकार में शब्द केवल एक ही बार प्रयुक्त होता है, परन्तु प्रसंगवश उसके एक से अधिक अर्थ निकलते हैं (जैसे रहिमन पानी राखिये में पानी)।
प्रश्न 2. उपमा और रूपक अलंकार को कैसे पहचानें?
उत्तर: उपमा अलंकार में उपमेय और उपमान की तुलना की जाती है और वाचक शब्द (सा, सी, से, सम, सरिस) अनिवार्य रूप से उपस्थित होते हैं। रूपक अलंकार में तुलना के स्थान पर उपमेय को ही उपमान मान लिया जाता है (अभेद आरोप) और इसमें कोई वाचक शब्द नहीं होता (जैसे चरण-कमल)।
प्रश्न 3. क्या प्रतियोगी परीक्षाओं में उभयालंकार से प्रश्न पूछे जाते हैं?
उत्तर: अधिकांश परीक्षाओं में शब्दालंकार (अनुप्रास, यमक, श्लेष) और अर्थालंकार (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति) से ही 95% प्रश्न आते हैं। उभयालंकार में संसृष्टि और संकर के सैद्धांतिक प्रश्न कभी-कभी उच्च-स्तरीय परीक्षाओं (TGT/PGT) में पूछे जाते हैं।
📌 संपादकीय परामर्श एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Disclaimer):
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