मध्यकालीन भारतीय भक्ति आंदोलन (Bhakti Movement) के निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा (Sant Kavya Dhara) के सर्वोच्च प्रतिनिधि संत कबीर दास जी (1398–1518 ई.) केवल एक उच्च कोटि के रहस्यवादी संत ही नहीं, अपितु भारतीय इतिहास के सबसे निर्भीक समाज सुधारक, युगप्रवर्तक और लोक-चेतना के महाकवि थे। उन्होंने धर्म, जाति, बाह्याडंबर, अंधविश्वास, पाखंड और सांप्रदायिक संकीर्णता पर अपनी तीखी, व्यंग्यात्मक और खरी वाणी से सीधा प्रहार किया।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में कबीर की भाषा और प्रतिभा का मूल्यांकन करते हुए लिखा है:“प्रतिभा उनमें बड़ी प्रखर थी, इसमें कोई संदेह नहीं। वे वाणी के डिक्टेटर थे।” (हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन)
कबीर दास जी निरक्षर थे — “मसि कागद छूयो नहीं, कलम गह्यो नहिं हाथ”, परन्तु उनके द्वारा उच्चरित लोकवाणी को उनके प्रधान शिष्य धर्मदास ने ‘बीजक’ (साखी, सबद, रमैनी) में संकलित किया। प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UPSC Hindi Literature, UPPSC, BPSC, UGC NET/JRF, UP TGT/PGT, CTET और पुलिस भर्ती में कबीर की साखियों के भावार्थ, प्रतीकार्थ, सधुक्कड़ी भाषा (पंचमेल खिचड़ी) और उलटबासियों पर 3 से 5 प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं। नीचे कबीर दास का साहित्यिक परिचय, 50 से अधिक अमर दोहे (सरल हिंदी भावार्थ सहित) और विगत वर्षों के 10 हल प्रश्न प्रस्तुत हैं।
संत कबीर दास: एक नज़र में (Executive Summary Table)
| विवरण पैरामीटर (Parameter) | प्रामाणिक ऐतिहासिक विवरण (Official Specifications) |
|---|---|
| जन्म एवं काल | संवत् 1455 (सन् 1398 ई.), लहरतारा, काशी (वाराणसी, उत्तर प्रदेश) |
| महापरिनिर्वाण / देहावसान | संवत् 1575 (सन् 1518 ई.), मगहर (संत कबीर नगर, उत्तर प्रदेश) |
| माता-पिता (पालनकर्ता) | नीरू (जुलाहा) एवं नीमा |
| आध्यात्मिक गुरु | स्वामी रामानंद जी (काशी के पंचगंगा घाट पर राम नाम का दीक्षा मंत्र) |
| पत्नी एवं संतान | पत्नी: लोई | पुत्र: कमाल | पुत्री: कमाली |
| काव्यधारा | निर्गुण ज्ञानाश्रयी संत काव्यधारा (भक्तिकाल के प्रवर्तक कवि) |
| मूल ग्रंथ / संकलन | ‘बीजक’ (तीन अंग: साखी – दोहा छंद, सबद – गेय पद, रमैनी – चौपाई) |
| काव्य भाषा | सधुक्कड़ी एवं पंचमेल खिचड़ी (अवधी, ब्रज, भोजपुरी, राजस्थानी, पंजाबी, अरबी-फारसी) |
| प्रमुख उपाधि | ‘वाणी का डिक्टेटर’ (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा प्रदत्त) |
| प्रमुख परीक्षा क्षेत्र | UPSC CSE, UGC NET, UP TGT/PGT, BPSC, CTET, UP Police |
1. कबीर दास का काव्य-दर्शन एवं साहित्यिक विशेषताएं (Philosophical Tenets)
कबीर का काव्य अनुभूति की सच्चाई और आत्म-साक्षात्कार पर आधारित है। उनके दर्शन के मुख्य आधार स्तंभ हैं:
- गुरु की सर्वोच्चता (Guru Mahima): कबीर के अनुसार गुरु ही वह माध्यम है जो अज्ञानी जीव को ईश्वर (परब्रह्म) का साक्षात्कार कराता है। वे गुरु को गोविंद से भी उच्च स्थान देते हैं।
- निर्गुण राम की उपासना: कबीर के ‘राम’ दशरथ पुत्र सगुण अवतार नहीं हैं, बल्कि वे घट-घट व्यापी, निराकार, अजन्मा और सर्वव्यापी चेतना हैं — “दसरथ सुत तिहुँ लोक बखाना, राम नाम का मरम है आना।”
- बाह्याडंबर एवं पाखंड का खंडन: उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की कुरीतियों, मूर्ति पूजा, तीर्थाटन, नमाज, रोजा, छुआछूत और जात-पात का तीखा खंडन किया।
- रहस्यवाद एवं उलटबासियां: कबीर के काव्य में साधनात्मक एवं भावनात्मक रहस्यवाद मिलता है। उन्होंने आध्यात्मिक रहस्यों को समझाने हेतु ‘उलटबासियों’ (Paradoxical verses) का प्रयोग किया (जैसे: “एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढ़ा सिंह चरावै गाई”).
विस्तृत सामासिक व्याकरण हेतु पढ़ें: समास के भेद, परिभाषा और 50+ उदाहरण: जानें समास विग्रह के 6 नियम
2. संत कबीर दास के 50+ प्रसिद्ध दोहे एवं सरल हिंदी भावार्थ (Master Reference Table)
(क) गुरु महिमा के अमर दोहे (Guru Mahima):
- गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय। बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय॥
भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि यदि मेरे सम्मुख गुरु और भगवान (गोविंद) दोनों एक साथ खड़े हों, तो मैं पहले किसके चरण स्पर्श करूँ? ऐसी दुविधा में मैं अपने गुरु के चरणों में ही शीश नवाऊंगा, क्योंकि गुरु की कृपा और ज्ञान के कारण ही मुझे गोविंद के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। - सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब बनराय। सात समुंदर की मसि करूँ, गुरु गुन लिखा न जाय॥
भावार्थ: संपूर्ण पृथ्वी को कागज बना दिया जाए, वनों के सभी वृक्षों की कलमें बना ली जाएं और सातों समुद्रों के जल को स्याही बना लिया जाए, तब भी गुरु के असीम गुणों और उपकारों का वर्णन नहीं किया जा सकता। - गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट। अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥
भावार्थ: गुरु कुम्हार के समान है और शिष्य मिट्टी के कच्चे घड़े के समान। जिस प्रकार कुम्हार घड़े को सुंदर रूप देने हेतु अंदर से हाथ का सहारा देता है और बाहर से हलकी चोट मारता है, उसी प्रकार गुरु शिष्य के अवगुणों को दूर करने हेतु बाहर से कठोर अनुशासन रखता है पर भीतर से अगाध स्नेह रखता है। - जाका गुरु भी अंधला, चेला खरा निरंध। अंधे को अंधा मिला, पड़ा भुंइम में बंध॥
भावार्थ: जिसका गुरु स्वयं अज्ञानी (अंधा) हो और शिष्य भी मूर्ख हो, तो दोनों एक-दूसरे का मार्गदर्शन नहीं कर सकते; ठीक वैसे ही जैसे एक अंधा दूसरे अंधे का हाथ पकड़कर गड्ढे में गिर पड़ता है। - कबीर ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और। हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर॥
भावार्थ: कबीर कहते हैं कि वे मनुष्य अत्यंत अज्ञानी हैं जो गुरु को साधारण मनुष्य समझते हैं। यदि ईश्वर नाराज हो जाएं तो गुरु की शरण मिल सकती है, परन्तु यदि गुरु ही रुष्ट हो जाएं तो संसार में कहीं शरण नहीं मिलती।
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(ख) नीति, आचरण एवं व्यवहार दर्शन के दोहे (Ethics & Conduct):
- ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥
भावार्थ: हमें अपने अहंकार और घमंड को त्यागकर ऐसी मधुर व विनम्र वाणी बोलनी चाहिए, जिससे सुनने वाले का हृदय प्रसन्न और शांत हो जाए तथा बोलने वाले को भी आत्मिक शांति प्राप्त हो। - बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागैं अति दूर॥
भावार्थ: धन, पद या शक्ति में बड़ा होने का कोई महत्व नहीं है, यदि उससे किसी का उपकार न हो सके; ठीक वैसे ही जैसे खजूर का पेड़ बहुत ऊंचा होता है, परन्तु न तो राहगीर को छाया देता है और उसके फल भी बहुत दूर लगते हैं। - काल करै सो आज कर, आज करै सो अब। पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥
भावार्थ: समय अत्यंत मूल्यवान है। जो काम कल करना है उसे आज करो और जो आज करना है उसे अभी पूरा करो। जीवन अनिश्चित है, यदि अगले ही पल प्रलय या मृत्यु आ गई तो कार्य कब करोगे? - धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥
भावार्थ: मन को धैर्य रखना चाहिए क्योंकि संसार में प्रत्येक कार्य अपने निश्चित समय पर ही सिद्ध होता है। माली भले ही किसी पौधे में सौ घड़े पानी डाल दे, परन्तु फल तभी लगेगा जब उसकी अनुकूल ऋतु आएगी। - निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। बिनु पानी, साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥
भावार्थ: जो व्यक्ति हमारी बुराई या आलोचना करता है, उसे अपने समीप सम्मानपूर्वक रखना चाहिए। वह बिना साबुन और पानी के हमारी कमियों को उजागर करके हमारे स्वभाव और चरित्र को पवित्र व निर्मल बना देता है। - साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय॥
भावार्थ: सज्जन पुरुष का स्वभाव सूप (अनाज फटकने वाले पात्र) जैसा होना चाहिए। जिस प्रकार सूप अच्छे अन्न (तत्व) को अपने पास रख लेता है और व्यर्थ के भूसे (कचरे) को उड़ा देता है, वैसे ही सज्जन अच्छाइयों को ग्रहण करते हैं और बुराइयों को त्याग देते हैं। - तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँवन तर होय। कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय॥
भावार्थ: पैरों के नीचे पड़े छोटे से तिनके को भी तुच्छ समझकर उसका तिरस्कार नहीं करना चाहिए। यदि वही तिनका हवा से उड़कर आँख में पड़ जाए, तो वह असहनीय पीड़ा देता है। अतः किसी भी दुर्बल व्यक्ति का अपमान न करें। - साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हिरदै साँच है, ताके हिरदै आप॥
भावार्थ: सत्य के समान संसार में कोई तपस्या नहीं है और झूठ के समान कोई पाप नहीं है। जिस मनुष्य के हृदय में सत्य का निवास होता है, उसके हृदय में साक्षात् ईश्वर का वास होता है। - जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥
भावार्थ: किसी भी ज्ञानी या साधु पुरुष से उसकी जाति या कुल नहीं पूछना चाहिए, बल्कि उसके ज्ञान का आदर करना चाहिए; जैसे मूल्य तलवार की धार का होता है, म्यान का कोई मोल नहीं होता। - माटी कहै कुम्हार सों, तू क्या रौंदे मोहि। इक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोहि॥
भावार्थ: मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तू अपने घमंड में मुझे पैरों से रौंद रहा है, परन्तु एक दिन ऐसा आएगा (मृत्यु के पश्चात) जब तू इसी मिट्टी में विलीन होगा और मैं तुझे अपने भीतर समेट लूँगी। - पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥
भावार्थ: संसार में असंख्य लोग बड़े-बड़े धर्मग्रंथ और पोथियां पढ़कर मृत्यु को प्राप्त हो गए, परन्तु कोई सच्चा ज्ञानी न बन सका। जो व्यक्ति प्रेम के ढाई अक्षर को आत्मसात कर लेता है, वही सच्चा ज्ञानी और पंडित है। - कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढ़ै बन माहिं। ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखै नाहिं॥
भावार्थ: कस्तूरी मृग की अपनी नाभि में ही सुगंधित कस्तूरी होती है, परन्तु वह अज्ञानतावश उसकी सुगंध की खोज में पूरे जंगल में भटकता रहता है। इसी प्रकार परमात्मा प्रत्येक मनुष्य के घट-घट (हृदय) में विद्यमान हैं, पर दुनिया उन्हें मंदिरों-मस्जिदों में खोजती फिरती है। - माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥
भावार्थ: हाथों में मोतियों की माला फेरते हुए युग बीत गए, परन्तु मन का विकार और चंचलता दूर नहीं हुई। कबीर कहते हैं कि हाथ की माला को छोड़कर अपने मन के मोतियों को फेरो अर्थात अंतःकरण को शुद्ध करो। - जल में कुंभ, कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी। फूटा कुंभ जल जलहिं समाना, यह तत कथ्यौ गियानी॥
भावार्थ: पानी में घड़ा है और घड़े के अंदर भी पानी है, बाहर-भीतर एक ही जल है। जब घड़ा फूट जाता है तो अंदर का जल बाहर के जल में विलीन हो जाता है। इसी प्रकार जीवात्मा अज्ञान का शरीर रूपी घड़ा नष्ट होने पर परमात्मा में लीन हो जाती है। - कबीर सो धन संचे, जो कबहूँ ना खूट। गांठी बांधे ना रहे, चोर न सके लूट॥
भावार्थ: कबीर कहते हैं कि उस राम-नाम रूपी अविनाशी धन का संचय करो जो कभी समाप्त नहीं होता, जिसे गांठ बांधकर रखने की आवश्यकता नहीं और जिसे कोई चोर चुरा नहीं सकता।
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(ग) सामाजिक समरसता, बाह्याडंबर विरोध एवं चेतावनी के दोहे (Social Reform):
- पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार। ताते यह चाकी भली, पीस खाय संसार॥
भावार्थ: यदि पत्थर पूजने से परमात्मा की प्राप्ति होती हो, तो मैं पूरे पहाड़ की पूजा करने को तैयार हूँ। उस निर्जीव मूर्ति से तो घर की पत्थर की चक्की कहीं श्रेष्ठ है, जिसका पिसा हुआ अन्न खाकर पूरा संसार अपना पेट भरता है। - कांकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई चुनाय। ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥
भावार्थ: कंकड़ और पत्थर जोड़कर मस्जिद बना ली और उस पर चढ़कर मुल्ला जोर-जोर से अजान देता है। कबीर पूछते हैं कि क्या तुम्हारा खुदा बहरा हो गया है जो उसे चिल्लाकर पुकारना पड़ता है? ईश्वर तो अंतर्यामी हैं। - हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना। आपस में दोउ लरि-लरि मूए, मरम न कोउ जाना॥
भावार्थ: हिंदू कहते हैं कि उन्हें राम प्रिय हैं और मुस्लिम कहते हैं कि उन्हें रहमान प्रिय हैं। दोनों संप्रदाय आपस में लड़-लड़कर नष्ट हो गए, परन्तु सत्य के मूल मर्म को किसी ने नहीं समझा कि ईश्वर एक ही है। - जो तू बाम्हन बम्हनी जाया, तो आन बाट काहे नहिं आया। जो तू तुरुक तुरुकनी जाया, तो भीतर खतना क्यों न कराया॥
भावार्थ: कबीर जन्म आधारित जाति व्यवस्था पर तीखा प्रहार करते हुए पूछते हैं कि यदि तू श्रेष्ठ ब्राह्मण है तो तेरा जन्म किसी अलग मार्ग से क्यों नहीं हुआ? सब समान रूप से जन्म लेते हैं, अतः जाति का भेद व्यर्थ है। - माया मुई न मन मुआ, मरि-मरि गया सरीर। आसा त्रिसना ना मुई, कह गए दास कबीर॥
भावार्थ: संसार में शरीर बार-बार नष्ट होकर जन्म लेता रहा, परन्तु न तो सांसारिक माया मरी और न ही मन की चंचलता समाप्त हुई। मनुष्य की वासनाएं और तृष्णाएं कभी नहीं मरतीं। - मन ना रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा। दाढ़ी बढ़ाय के जोगी बनि गइले बकरा॥
भावार्थ: मन को तो ईश्वर प्रेम के रंग में रंगा नहीं, केवल गेरुए वस्त्र पहनकर जोगी बन गए। बड़ी-बड़ी दाढ़ी बढ़ाकर बकरे की तरह वेश धारण करने से कोई ज्ञानी या महात्मा नहीं बन जाता। - कबीर सूता क्या करै, जागि न जपै मुरारि। एक दिन सोवन होइगो, लंबे पाँव पसारि॥
भावार्थ: हे अज्ञानी मनुष्य! तू मोह-निद्रा में क्यों सोया हुआ है? जागकर परमात्मा का स्मरण क्यों नहीं करता? स्मरण रख कि एक दिन तुझे मृत्यु की गोद में लंबे पैर पसारकर चिरनिद्रा में सोना ही पड़ेगा। - हाड़ जलै जस लाकड़ी, केस जलै जस घास। सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास॥
भावार्थ: श्मशान में हड्डियां लकड़ी की तरह जलती हैं और बाल घास की तरह जलते हैं। इस सुंदर नश्वर शरीर का ऐसा दारुण अंत देखकर कबीर का मन संसार से विरक्त और उदास हो गया। - झूठे को झूठा मिले, दूणा बंधे सनेह। झूठे को सांचा मिले, तब ही टूटे नेह॥
भावार्थ: जब एक झूठे व्यक्ति को दूसरा झूठा मिलता है तो उनका स्वार्थ सिद्ध होने से प्रेम दोगुना बढ़ जाता है। परन्तु जब झूठे का पाला सच्चे व्यक्ति से पड़ता है, तो तुरंत उनका संबंध टूट जाता है। - कबीर खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर। ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर॥
भावार्थ: कबीर सांसारिक प्रपंचों से तटस्थ होकर समाज के चौराहे पर खड़े हैं और निष्पक्ष भाव से सभी के कल्याण की कामना करते हैं। उनका न तो किसी से विशेष राग है और न ही किसी से कोई द्वेष। - कहा पुरातन बात यह, कहा नवीन विचार। जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जानु मसान॥
भावार्थ: चाहे पुरानी बात हो या नया विचार, जिस हृदय में प्रेम और करुणा का संचार नहीं होता, वह हृदय जीवित मनुष्य का नहीं बल्कि श्मशान के समान उजाड़ और निर्जीव है। - साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाय॥
भावार्थ: कबीर ईश्वर से केवल उतनी ही धन-संपत्ति मांगते हैं जिससे उनके परिवार का भरण-पोषण हो सके, वे स्वयं भी भूखे न रहें और उनके द्वार पर आया कोई अतिथि या साधु भी भूखा न लौटे। - रूखा सूखा खाइ के, ठंडा पानी पीव। देखि पराई चूपड़ी, मत ललचावै जीव॥
भावार्थ: अपने परिश्रम से जो रूखा-सूखा अन्न प्राप्त हो, उसे खाकर संतोषपूर्वक ठंडा पानी पी लेना चाहिए। दूसरों के घी से चुपड़े पकवान देखकर अपने मन में लालच या ईर्ष्या नहीं लानी चाहिए। - दोष पराए देखि करि, चल्या हसंत हसंत। अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत॥
भावार्थ: मनुष्य दूसरों के छोटे-छोटे दोषों को देखकर हंसता हुआ उनकी निंदा करता फिरता है, परन्तु उसे अपने उन अनगिनत अवगुणों की सुध नहीं आती जिनका न कोई आदि है और न कोई अंत। - कबीर घास न नींदिए, जो पाँयन तर होइ। उड़ि पड़ै जब आँखि में, खरी दुहेली होइ॥
भावार्थ: पैरों के नीचे दबने वाली घास का भी तिरस्कार न करें; क्योंकि जब उसका छोटा सा तिनका आंख में गिरता है तो वह भीषण कष्ट देता है। समाज के निम्न वर्ग को कभी कमजोर न समझें। - बड़ा भया तो क्या भया, संतो महा विचार। अपने मन को साध ले, यही ज्ञान को सार॥
भावार्थ: केवल बाहरी प्रतिष्ठा पा लेने से कोई बड़ा नहीं बनता। अपने चंचल मन को वश में कर लेना ही समस्त आध्यात्मिक ज्ञान का वास्तविक सार है। - जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम। दोउ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम॥
भावार्थ: यदि नाव में पानी भरने लगे और घर में आवश्यकता से अधिक धन बढ़ने लगे, तो बुद्धिमान व्यक्ति का यही कर्तव्य है कि वह दोनों हाथों से उसे बाहर निकाले (दान करे), अन्यथा विनाश निश्चित है। - कबीर लज्जा लोक की, क्या बिगाड़े मोय। जब लग नाता राम सों, तब लग सब सुख होय॥
भावार्थ: संसार की लोक-लाज या आलोचना मेरा क्या बिगाड़ सकती है? जब तक मेरा संबंध परमात्मा से जुड़ा है, तब तक मुझे आत्मिक सुख और निर्भयता प्राप्त होती रहेगी। - जाति-पांति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई॥
भावार्थ: ईश्वर के दरबार में किसी की जाति, कुल या वर्ण नहीं पूछा जाता। जो भी सच्चे हृदय से ईश्वर का भजन करता है, वह साक्षात् ईश्वर का ही प्रिय बन जाता है। - उजला कपड़ा पहिरि करि, पान सुपारी खाहिं। एको हरि के नाम बिनु, बांधे जमपुर जाहिं॥
भावार्थ: जो लोग केवल सफेद वस्त्र पहनकर और पान-सुपारी चबाकर विलासिता में जीवन बिताते हैं, पर ईश्वर का स्मरण नहीं करते, वे अंत में यमराज के दूतों द्वारा बांधकर नर्क में ले जाए जाते हैं। - जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ। मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥
भावार्थ: जो साधक गहरे जल में उतरकर परिश्रमपूर्वक खोज करते हैं, उन्हें अमूल्य मोती (ईश्वर/ज्ञान) प्राप्त होता है। परन्तु जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठा रह जाता है, वह जीवन भर खाली हाथ रहता है। - चलती चाकी देखकर, दिया कबीरा रोय। दुई पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय॥
भावार्थ: कबीर चलती हुई चक्की को देखकर रो पड़े कि चक्की के दो पाटों (आकाश और पाताल / जन्म और मृत्यु) के बीच पिसकर कोई भी प्राणी जीवित या साबुत नहीं बच पाता। - ज्यों तिल माहीं तेल है, ज्यों चकमक में आग। तेरा साईं तुझ ही में है, जागि सकै तो जाग॥
भावार्थ: जिस प्रकार तिल के अंदर तेल छिपा रहता है और चकमक पत्थर के भीतर अग्नि समाई रहती है, उसी प्रकार तुम्हारा परमात्मा तुम्हारे ही भीतर विद्यमान है; यदि तुममें चेतना है तो उसे पहचानो। - जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माहिं॥
भावार्थ: जब तक मेरे भीतर ‘मैं’ (अहंकार) था, तब तक ईश्वर की प्राप्ति नहीं हुई थी। अब जब ईश्वर का साक्षात्कार हो गया, तो मेरा अहंकार पूरी तरह विलीन हो गया। ज्ञान के दीपक ने अज्ञान का अंधकार मिटा दिया। - करता था सो क्यों रहा, अब करि क्यों पछताय। बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ ते खाय॥
भावार्थ: जब तू पाप कर्म कर रहा था तब क्यों नहीं रुका? अब बुरा फल मिलने पर क्यों पछताता है? यदि तूने बबूल का काँटेदार वृक्ष बोया है, तो उस पर मीठे आम के फल कैसे लग सकते हैं? - लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट। पाछे फिरे पछताओगे, जब प्राण जाहिं छूट॥
भावार्थ: इस जीवन में राम-नाम रूपी अनमोल खजाने की खुली लूट मची है, जितना संचय कर सकते हो कर लो। बाद में जब शरीर से प्राण निकल जाएंगे, तो पछताने के अतिरिक्त कुछ शेष नहीं रहेगा। - अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप। अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥
भावार्थ: जीवन में किसी भी वस्तु की अति (अधिकता) हानिकारक होती है। न तो बहुत अधिक बोलना अच्छा है और न ही बिल्कुल चुप रहना; जैसे न बहुत अधिक वर्षा अच्छी होती है और न ही बहुत तेज धूप। - कबीर मंदिर लाख का, जड़िया कंचन हीर। दिवस चारि का पेखना, बिनसि जाएगा खीर॥
भावार्थ: यह शरीर सोने और हीरों से जड़े लाखों के महल के समान सुंदर भले ही दिखता हो, परन्तु यह संसार चार दिन का मेला है और यह शरीर खीर की तरह क्षणभर में नष्ट हो जाने वाला है। - नहाए धोए क्या हुआ, जो मन का मैल न जाय। मीन सदा जल में रहै, धोए बास न जाय॥
भावार्थ: तीर्थों में बार-बार नहाने-धोने से क्या लाभ, यदि मन का कपट और मैल दूर न हुआ? मछली तो आजीवन जल में ही रहती है, परन्तु उसे कितना भी धो लो, उसकी दुर्गंध कभी दूर नहीं होती। - काहे री नलिनी तू कुमिलानी, तेरे ही नालि सरोवर पानी। जल में उतपति जल में बास, जल में नलिनी तोर निवास॥
भावार्थ: कबीर आत्मा रूपी कमलिनी को संबोधित करते हुए कहते हैं कि तू क्यों मुरझा रही है, जबकि तेरी जड़ें परमात्मा रूपी जल में ही स्थित हैं? आत्मा का मूल परमात्मा ही है, अतः सांसारिक कष्टों से भयभीत नहीं होना चाहिए।
3. विगत वर्षों की प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे गए 10 हल प्रश्न (Practice MCQs)
प्रश्न 1. कबीर दास जी भक्तिकाल की किस काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि हैं? (UP Police SI 2021)
(A) सगुण रामभक्ति शाखा
(B) सगुण कृष्णभक्ति शाखा
(C) निर्गुण ज्ञानाश्रयी (संत) शाखा
(D) निर्गुण प्रेमाश्रयी (सूफी) शाखा
उत्तर: (C) निर्गुण ज्ञानाश्रयी (संत) शाखा
व्याख्या: कबीर दास जी भक्तिकाल के निर्गुण ज्ञानाश्रयी संत काव्यधारा के प्रवर्तक कवि हैं, जिन्होंने ज्ञान और नाम-स्मरण को मुक्ति का साधन माना।
प्रश्न 2. कबीर की वाणी का प्रामाणिक संग्रह ‘बीजक’ किसके द्वारा संकलित किया गया था? (UPSC CSAT / RO-ARO)
(A) रैदास
(B) धर्मदास
(C) दादू दयाल
(D) सुंदरदास
उत्तर: (B) धर्मदास
व्याख्या: कबीर दास के निरक्षर होने के कारण उनके मुख्य शिष्य धर्मदास ने संवत् 1521 (सन् 1464 ई.) में उनकी वाणियों को ‘बीजक’ नाम से संकलित किया।
प्रश्न 3. कबीर दास जी को ‘वाणी का डिक्टेटर’ किस प्रसिद्ध आलोचक ने कहा है? (UP TGT/PGT Hindi)
(A) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
(B) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
(C) डॉ. रामविलास शर्मा
(D) डॉ. नगेंद्र
उत्तर: (B) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
व्याख्या: हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक ‘कबीर’ में लिखा कि भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था, वे वाणी के डिक्टेटर (तानाशाह) थे।
प्रश्न 4. ‘बीजक’ के कितने मुख्य भाग (अंग) हैं? (BPSC शिक्षक भर्ती)
(A) 2
(B) 3 (साखी, सबद, रमैनी)
(C) 4
(D) 5
उत्तर: (B) 3 (साखी, सबद, रमैनी)
व्याख्या: बीजक के तीन अंग हैं — ‘साखी’ (दोहा छंद में ज्ञानोपदेश), ‘सबद’ (गेय पद) तथा ‘रमैनी’ (चौपाई व दोहा छंद में दार्शनिक विचार)।
प्रश्न 5. कबीर की काव्य भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ नाम किसने दिया? (UGC NET Hindi)
(A) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
(B) श्यामसुंदर दास
(C) राहुल सांकृत्यायन
(D) ग्रियर्सन
उत्तर: (A) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
व्याख्या: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कबीर की भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ कहा, जबकि डॉ. श्यामसुंदर दास ने इसे ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहा था।
प्रश्न 6. “मसि कागद छूयो नहीं, कलम गह्यो नहिं हाथ” पंक्ति किस कवि के संदर्भ में प्रसिद्ध है? (CTET)
(A) सूरदास
(B) तुलसीदास
(C) कबीर दास
(D) बिहारीलाल
उत्तर: (C) कबीर दास
व्याख्या: यह पंक्ति कबीर दास जी के निरक्षर होने और उनके द्वारा अनुभूत ज्ञान को मौखिक रूप से प्रकट करने को प्रमाणित करती है।
प्रश्न 7. “पाँहन पूजै हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार” दोहे में कबीर ने किस सामाजिक बुराई का विरोध किया है? (UP Constable)
(A) जाति प्रथा
(B) मूर्ति पूजा एवं बाह्याडंबर
(C) बाल विवाह
(D) सती प्रथा
उत्तर: (B) मूर्ति पूजा एवं बाह्याडंबर
व्याख्या: कबीर ने इस दोहे के माध्यम से पत्थरों की निष्प्राण मूर्तियों की पूजा और धार्मिक दिखावे पर कड़ा व्यंग्य किया है।
प्रश्न 8. कबीर दास जी के आध्यात्मिक गुरु कौन थे? (UPPSC Staff Nurse / RO)
(A) स्वामी रामानंद
(B) वल्लभाचार्य
(C) नरहरिदास
(D) गुरु गोरखनाथ
उत्तर: (A) स्वामी रामानंद
व्याख्या: कबीर दास जी ने काशी के पंचगंगा घाट पर स्वामी रामानंद के चरणों का स्पर्श पाकर उनसे ‘राम’ नाम का दीक्षा मंत्र ग्रहण किया था।
प्रश्न 9. कथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए: (UPSC Pattern)
- कथन (A): कबीर की उलटबासियों में अद्भुत एवं विस्मयकारी भावों की प्रधानता होती है।
- कारण (R): उलटबासियों का बाह्य अर्थ असंभव प्रतीत होता है, परन्तु उसका गूढ़ आध्यात्मिक प्रतीकार्थ अत्यंत गंभीर होता है।
(A) (A) और (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है।
(B) (A) और (R) दोनों सही हैं किन्तु (R), (A) सही व्याख्या नहीं है।
(C) (A) सही है परन्तु (R) गलत है।
(D) (A) गलत है परन्तु (R) सही है।
उत्तर: (A) (A) और (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है।
प्रश्न 10. संत कबीर दास जी का महापरिनिर्वाण (देहावसान) किस ऐतिहासिक स्थान पर हुआ था? (REET / TGT)
(A) काशी (वाराणसी)
(B) मगहर (संत कबीर नगर)
(C) प्रयागराज
(D) मथुरा
उत्तर: (B) मगहर (संत कबीर नगर)
व्याख्या: तत्कालीन अंधविश्वास (कि काशी में मरने से स्वर्ग और मगहर में मरने से नर्क मिलता है) को तोड़ने हेतु कबीर अपने अंतिम समय में मगहर चले गए और वहीं सन् 1518 ई. में देहत्याग किया।
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5. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1. कबीर दास के ‘राम’ और तुलसीदास के ‘राम’ में क्या मौलिक अंतर है?
उत्तर: तुलसीदास के राम दशरथ पुत्र, कौशल्या नंदन सगुण-साकार मर्यादा पुरुषोत्तम हैं जो धनुष-बाण धारण करते हैं। जबकि कबीर के राम निर्गुण, निराकार, अजन्मा और घट-घट में व्याप्त परम चेतना हैं।
प्रश्न 2. कबीर की भाषा को ‘पंचमेल खिचड़ी’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर: कबीर संत थे और पूरे भारत में भ्रमण करते थे। उनकी भाषा में खड़ी बोली, अवधी, ब्रज, राजस्थानी, भोजपुरी, पंजाबी तथा अरबी-फारसी के शब्द स्वाभाविक रूप से घुल-मिल गए थे, इसलिए डॉ. श्यामसुंदर दास ने इसे ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहा।
प्रश्न 3. कबीर दास जी ने मगहर में देहत्याग क्यों किया था?
उत्तर: मध्यकाल में यह अंधविश्वास फैला हुआ था कि काशी में मरने से स्वर्ग मिलता है और मगहर में मरने से गधे का जन्म (नर्क) मिलता है। इस पाखंड को तोड़ने और यह सिद्ध करने के लिए कि मुक्ति कर्म और ज्ञान से मिलती है स्थान से नहीं, कबीर अंतिम समय में मगहर चले गए।
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