Poems on Mahatma Gandhi in Hindi

Poems on Mahatma Gandhi in Hindi: गांधी जी पर 10 जोश और प्रेरणा से भरी कविताएं (शहीद दिवस विशेष)

Poems on Mahatma Gandhi in Hindi: भारत के इतिहास में मोहनदास करमचंद गांधी केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक युग का नाम है। सत्य और अहिंसा के इस पुजारी ने दुनिया को दिखाया कि बिना हथियार उठाए भी बड़ी से बड़ी जंग जीती जा सकती है।

हर साल 30 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि (शहीद दिवस) और 2 अक्टूबर को उनकी जयंती पर स्कूलों और कॉलेजों में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन मौकों पर छात्र और शिक्षक बापू को श्रद्धांजलि देने के लिए कविताओं का सहारा लेते हैं। कविताएं हमारी भावनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम हैं।

यहाँ हम आपके लिए Gandhi Ji Par Kavita का एक बेहतरीन संग्रह लेकर आए हैं। इसमें छोटे बच्चों के लिए आसान चार लाइन की कविताओं से लेकर सोहनलाल द्विवेदी जी की ओजस्वी रचनाएं तक शामिल हैं।

Table of Contents

एक नज़र में: कविताओं का संग्रह (Quick Poem Overview)

अपनी जरूरत और कक्षा के अनुसार सही कविता का चुनाव करें:

कविता का शीर्षक (Title)किसके लिए उपयुक्त (Best For)भाव (Mood)
चल पड़े जिधर…भाषण/प्रतियोगिता (Class 6-12)जोश और नेतृत्व (Energetic)
खादी की चदरियागायन (Singing)भक्ति और सादगी (Devotional)
बापू भोले भालेछोटे बच्चे (Class 1-3)प्यारा और सरल (Cute)
दे दी हमें आजादीसमूह गान (Group Song)देशभक्ति (Patriotic)
हे राम! (शहादत)30 जनवरी (शहीद दिवस)भावुक (Emotional)

Gandhi Ji Par Kavita (परिचय)

महात्मा गांधी सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि एक विचार थे जो आज भी जीवित है। 30 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि (शहीद दिवस) पर देश भर के स्कूलों में श्रद्धांजलि सभाएं होती हैं। यहाँ हम गांधी जी के सत्य, अहिंसा, त्याग और सादगी पर आधारित कुछ बेहतरीन हिंदी कविताएं (Poems on Mahatma Gandhi) प्रस्तुत कर रहे हैं। ये कविताएं न केवल बच्चों में देशभक्ति का जज्बा भरेंगी, बल्कि बड़ों को भी बापू के आदर्शों की याद दिलाएंगी।


Short Poem on Gandhi Ji for Kids (Class 1-5)

छोटे बच्चों (कक्षा 1 से 5) के लिए बड़ी कविताएं याद करना मुश्किल होता है। यहाँ सरल शब्दों में 4 लाइन की कविताएं दी गई हैं जो फैंसी ड्रेस या क्लास में सुनाने के लिए परफेक्ट हैं।

कविता 1: सत्य अहिंसा के पुजारी

“सत्य अहिंसा का था वो पुजारी,

कभी ना जिसने हिम्मत हारी।

सांस दी हमें आजादी की,

जन-जन जिसका है आभारी।

सादा जीवन, उच्च विचार,

बापू को है नमन हमारा बार-बार।”

कविता 2: बापू भोले भाले

“बापू भोले भाले थे,

हम सबके रखवाले थे।

हमें आजादी दिलवाई,

भारत की शान बढ़ाई।

चरखा खूब चलाते थे,

सबको गले लगाते थे।”

कविता 3: धोती और लाठी

“पहने वो खादी की धोती,

लाठी थी जिनकी शान।

दुबले-पतले, छोटे से थे,

पर वो थे देश की जान।

बच्चे कहते उनको बापू,

करते सब उनका सम्मान।”


Shaheed Diwas Poem in Hindi (30 जनवरी विशेष)

30 जनवरी का दिन भावुक करने वाला होता है। यह कविता गांधी जी के बलिदान और उनके अंतिम शब्दों “हे राम” को समर्पित है।

शीर्षक: वो विचार था, शरीर नहीं

“गोलियों की गूंज में भी,

राम नाम ही निकला था।

वो शरीर नहीं, विचार था,

जो कभी नहीं पिघला था।

रक्त की बूंदें गिरीं धरा पर,

बन गईं बीज आजादी के।

मार कर भी जो मर न सका,

हम वंशज हैं उस खादी के।

आज नमन है उस त्यागी को,

जिसने सब कुछ वार दिया।

सत्य-अहिंसा के अस्त्र से,

दुश्मन को भी हार दिया।”

(अज्ञात/लेखक द्वारा रचित)

संदर्भ (Context):

यह कविता बताती है कि नाथूराम गोडसे की गोलियां गांधी जी के शरीर को तो खत्म कर सकीं, लेकिन उनके विचारों को नहीं। मरते वक्त भी उनके लबों पर सिर्फ ईश्वर का नाम था, न कि नफरत।


Hindi Poems on Mahatma Gandhi : महात्मा गांधी पर लिखी गई प्रसिद्ध कविताएं

महात्मा गांधी पर बहुत से कवियों ने रचनाएं लिखी हैं , ऐसी ही कुछ प्रमुख रचनाएं यहां दी गई हैं.

गांधीजी

संत, महात्मा हो तुम जग के, बापू हो हम दीनों के
दलितों के अभीष्ट वर-दाता, आश्रय हो गतिहीनों के
आर्य अजातशत्रुता की उस परंपरा के स्वतः प्रमाण
सदय बंधु तुम विरोधियों के, निर्दय स्वजन अधीनों के!

– मैथिलीशरण गुप्त 

युगावतार

चल पड़े जिधर दो डग, मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि, पड़ गए कोटि दृग उसी ओर;
जिसके सिर पर निज धरा हाथ, उसके सिर-रक्षक कोटि हाथ
जिस पर निज मस्तक झुका दिया, झुक गए उसी पर कोटि माथ।

हे कोटिचरण, हे कोटिबाहु! हे कोटिरूप, हे कोटिनाम!
तुम एक मूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि! हे कोटि मूर्ति, तुमको प्रणाम!
युग बढ़ा तुम्हारी हंसी देख, युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख;
तुम अचल मेखला बन भू की, खींचते काल पर अमिट रेख।

तुम बोल उठे, युग बोल उठा, तुम मौन बने, युग मौन बना
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर, युग कर्म जगा, युगधर्म तना।
युग-परिवर्तक, युग-संस्थापक, युग-संचालक, हे युगाधार!
युग-निर्माता, युग-मूर्ति! तुम्हें, युग-युग तक युग का नमस्कार!

तुम युग-युग की रूढ़ियां तोड़, रचते रहते नित नई सृष्टि
उठती नवजीवन की नींवें, ले नवचेतन की दिव्य दृष्टि।
धर्माडंबर के खंडहर पर, कर पद-प्रहार, कर धराध्वस्त
मानवता का पावन मंदिर, निर्माण कर रहे सृजनव्यस्त!

बढ़ते ही जाते दिग्विजयी, गढ़ते तुम अपना रामराज
आत्माहुति के मणिमाणिक से, मढ़ते जननी का स्वर्ण ताज!
तुम कालचक्र के रक्त सने, दशनों को कर से पकड़ सुदृढ़
मानव को दानव के मुँह से, ला रहे खींच बाहर बढ़-बढ़।

पिसती कराहती जगती के, प्राणों में भरते अभय दान
अधमरे देखते हैं तुमको, किसने आकर यह किया त्राण?
दृढ़ चरण, सुदृढ़ करसंपुट से, तुम कालचक्र की चाल रोक
नित महाकाल की छाती पर लिखते करुणा के पुण्य श्लोक!

कँपता असत्य, कंपती मिथ्या, बर्बरता कंपती है थर-थर!
कँपते सिंहासन, राजमुकुट, कँपते खिसके आते भू पर।
हैं अस्त्र-शस्त्र कुंठित लुंठित सेनाएँ करती गृह-प्रयाण!
रणभेरी तेरी बजती है, उड़ता है तेरा ध्वज निशान!

हे युग-द्रष्टा, हे युग-स्रष्टा,
पढ़ते कैसा यह मोक्ष-मंत्र?
इस राजतंत्र के खंडहर में
उगता अभिनव भारत स्वतंत्र।

– सोहनलाल द्विवेदी

कविता का अर्थ (Meaning):

इस कविता में कवि कहते हैं कि गांधी जी जिस तरफ दो कदम बढ़ा देते थे, करोड़ों लोग (कोटि पग) उनके पीछे बिना सवाल किए चल पड़ते थे। उनकी एक नज़र जिस तरफ पड़ती थी, पूरा देश उसी ओर देखने लगता था। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि करोड़ों भारतवासियों की आवाज़ और शक्ति थे।


De Di Hame Azadi (प्रसिद्ध गीत/कविता)

यह फिल्म ‘जागृति’ (1954) का मशहूर गीत है, जिसे कवि प्रदीप ने लिखा था। यह कविता गांधी जी के अहिंसक आंदोलन का सार है। इसे समूह गान (Group Song) के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

दे दी हमें आजादी

दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
आंधी में भी जलती रही गांधी तेरी मशाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
धरती पे लड़ी तूने अजब ढंग की लड़ाई
दागी न कहीं तोप न बंदूक चलाई

दुश्मन के क़िले पर भी न की तूने चढ़ाई
वाह रे फ़कीर खूब क़रामात दिखाई
चुटकी में दुश्मनों को दिया देश से निकाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

रघुपति राघव राजा राम
शतरंज बिछा कर यहाँ बैठा था ज़माना
लगता था कि मुश्क़िल है फ़िरंगी को हराना
टक्कर थी बड़े ज़ोर की दुश्मन भी था दाना
पर तू भी था बापू बड़ा उस्ताद पुराना
मारा वो कस के दाँव के उल्टी सभी की चाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

रघुपति राघव राजा राम
जब-जब तेरा बिगुल बजा जवान चल पड़े
मज़दूर चल पड़े थे और किसान चल पड़े
हिंदू व मुसलमान, सिख, पठान चल पड़े

क़दमों में तेरी कोटि-कोटि प्राण चल पड़े
फूलों की सेज छोड़ के दौड़े जवाहरलाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

रघुपति राघव राजा राम
मन में थी अहिंसा की लगन तन पे लंगोटी
लाखों में घूमता था लिए सत्य की सोंटी
वैसे तो देखने में थी हस्ती तेरी छोटी
लेकिन तुझी झुकती थी हिमालय की चोटी

दुनिया में तू बेजोड़ था इन्सान बेमिसाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
रघुपति राघव राजा राम

जग में कोई जिया है तो बापू तूही जिया
तूने वतन की राह में सब कुछ लुटा दिया
मांगा न कोई तख़्त न तो ताज ही लिया
अमृत दिया सभी को मगर ख़ुद ज़हर पिया
जिस दिन तेरी चिता जली, रोया था महाकाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

रघुपति राघव राजा राम

– कवि प्रदीप

Inspiring Poem: गांधी बन के दिखलाना

यह कविता छात्रों को गांधी जी के गुणों को अपनाने की प्रेरणा देती है।

शीर्षक: आसान नहीं गांधी होना

“सिर्फ नोटों पर छपना ही,

गांधी होना नहीं होता।

गाल पर खाकर थप्पड़,

मुस्कराना आसान नहीं होता।

सत्य की राह पर चलना,

और कांटों से गुजरना।

अपनी नहीं, औरों की,

पीड़ा से दिन-रात मरना।

आओ आज कसम ये खाएं,

दिल में बापू को बसाएं।

हिंसा का हम त्याग करें,

भारत को फिर से विश्व गुरु बनाएं।”


Poems on Mahatma Gandhi in Hindi :  महात्मा गांधी पर लोकप्रिय कविताएं

भारत के बहुत से लोकप्रिय कवियों न भारत के राष्ट्रपिता को समर्पित करते हुए अपनी कविताएं लिखीं…

तुम मांस-हीन, तुम रक्तहीन, हे अस्थि-शेष! तुम अस्थिहीन

तुम मांस-हीन, तुम रक्तहीन,
हे अस्थि-शेष! तुम अस्थिहीन,
तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल,
हे चिर पुराण, हे चिर नवीन!
तुम पूर्ण इकाई जीवन की,
जिसमें असार भव-शून्य लीन;
आधार अमर, होगी जिस पर
भावी की संस्कृति समासीन!
तुम मांस, तुम्हीं हो रक्त-अस्थि,
निर्मित जिनसे नवयुग का तन,
तुम धन्य! तुम्हारा नि:स्व-त्याग
है विश्व-भोग का वर साधन।
इस भस्म-काम तन की रज से
जग पूर्ण-काम नव जग-जीवन
बीनेगा सत्य-अहिंसा के
ताने-बानों से मानवपन!
सदियों का दैन्य-तमिस्र तूम,
धुन तुमने कात प्रकाश-सूत,
हे नग्न! नग्न-पशुता ढँक दी
बुन नव संस्कृत मनुजत्व पूत।
जग पीड़ित छूतों से प्रभूत,
छू अमित स्पर्श से, हे अछूत!
तुमने पावन कर, मुक्त किए
मृत संस्कृतियों के विकृत भूत!
सुख-भोग खोजने आते सब,
आये तुम करने सत्य खोज,
जग की मिट्टी के पुतले जन,
तुम आत्मा के, मन के मनोज!
जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर
चेतना, अहिंसा, नम्र-ओज,
पशुता का पंकज बना दिया
तुमने मानवता का सरोज!
पशु-बल की कारा से जग को
दिखलाई आत्मा की विमुक्ति,
विद्वेष, घृणा से लड़ने को
सिखलाई दुर्जय प्रेम-युक्ति;
वर श्रम-प्रसूति से की कृतार्थ
तुमने विचार-परिणीत उक्ति,
विश्वानुरक्त हे अनासक्त!
सर्वस्व-त्याग को बना भुक्ति!
सहयोग सिखा शासित-जन को
शासन का दुर्वह हरा भार,
होकर निरस्त्र, सत्याग्रह से
रोका मिथ्या का बल-प्रहार :
बहु भेद-विग्रहों में खोई
ली जीर्ण जाति क्षय से उबार,
तुमने प्रकाश को कह प्रकाश,
औ अन्धकार को अन्धकार।
उर के चरखे में कात सूक्ष्म
युग-युग का विषय-जनित विषाद,
गुंजित कर दिया गगन जग का
भर तुमने आत्मा का निनाद।
रंग-रंग खद्दर के सूत्रों में
नव-जीवन-आशा, स्पृह्लाद,
मानवी-कला के सूत्रधार!
हर लिया यन्त्र-कौशल-प्रवाद।
जड़वाद जर्जरित जग में तुम
अवतरित हुए आत्मा महान,
यन्त्राभिभूत जग में करने
मानव-जीवन का परित्राण;
बहु छाया-बिम्बों में खोया
पाने व्यक्तित्व प्रकाशवान,
फिर रक्त-माँस प्रतिमाओं में
फूँकने सत्य से अमर प्राण!

संसार छोड़ कर ग्रहण किया
नर-जीवन का परमार्थ-सार,
अपवाद बने, मानवता के
ध्रुव नियमों का करने प्रचार;
हो सार्वजनिकता जयी, अजित!
तुमने निजत्व निज दिया हार,
लौकिकता को जीवित रखने
तुम हुए अलौकिक, हे उदार!
मंगल-शशि-लोलुप मानव थे
विस्मित ब्रह्मांड-परिधि विलोक,
तुम केन्द्र खोजने आये तब
सब में व्यापक, गत राग-शोक;
पशु-पक्षी-पुष्पों से प्रेरित
उद्दाम-काम जन-क्रान्ति रोक,
जीवन-इच्छा को आत्मा के
वश में रख, शासित किए लोक।
था व्याप्त दिशावधि ध्वान्त भ्रान्त
इतिहास विश्व-उद्भव प्रमाण,
बहु-हेतु, बुद्धि, जड़ वस्तु-वाद
मानव-संस्कृति के बने प्राण;
थे राष्ट्र, अर्थ, जन, साम्य-वाद
छल सभ्य-जगत के शिष्ट-मान,
भू पर रहते थे मनुज नहीं,
बहु रूढि-रीति प्रेतों-समान–
तुम विश्व मंच पर हुए उदित
बन जग-जीवन के सूत्रधार,
पट पर पट उठा दिए मन से
कर नव चरित्र का नवोद्धार;
आत्मा को विषयाधार बना,
दिशि-पल के दृश्यों को सँवार,
गा-गा–एकोहं बहु स्याम,
हर लिए भेद, भव-भीति-भार!
एकता इष्ट निर्देश किया,
जग खोज रहा था जब समता,
अन्तर-शासन चिर राम-राज्य,
औ’ वाह्य, आत्महन-अक्षमता;
हों कर्म-निरत जन, राग-विरत,
रति-विरति-व्यतिक्रम भ्रम-ममता,
प्रतिक्रिया-क्रिया साधन-अवयव,
है सत्य सिद्ध, गति-यति-क्षमता।
ये राज्य, प्रजा, जन, साम्य-तन्त्र
शासन-चालन के कृतक यान,
मानस, मानुषी, विकास-शास्त्र
हैं तुलनात्मक, सापेक्ष ज्ञान;
भौतिक विज्ञानों की प्रसूति
जीवन-उपकरण-चयन-प्रधान,
मथ सूक्ष्म-स्थूल जग, बोले तुम–
मानव मानवता का विधान!
साम्राज्यवाद था कंस, बन्दिनी
मानवता पशु-बलाक्रान्त,
श्रृंखला दासता, प्रहरी बहु
निर्मम शासन-पद शक्ति-भ्रान्त;
कारा-गृह में दे दिव्य जन्म
मानव-आत्मा को मुक्त, कान्त,
जन-शोषण की बढ़ती यमुना
तुमने की नत-पद-प्रणत, शान्त!
कारा थी संस्कृति विगत, भित्ति
बहु धर्म-जाति-गत रूप-नाम,
बन्दी जग-जीवन, भू-विभक्त,
विज्ञान-मूढ़ जन प्रकृति-काम;
आए तुम मुक्त पुरुष, कहने–
मिथ्या जड़-बन्धन, सत्य राम,
नानृतं जयति सत्यं, मा भैः
जय ज्ञान-ज्योति, तुमको प्रणाम!

-सुमित्रानंदन पंत

एक दिन इतिहास पूछेगा कि तुमने जन्म गांधी को दिया था

एक दिन इतिहास पूछेगा
कि तुमने जन्म गांधी को दिया था,
जिस समय हिंसा,
कुटिल विज्ञान बल से हो समंवित,
धर्म, संस्कृति, सभ्यता पर डाल पर्दा,
विश्व के संहार का षड्यंत्र रचने में लगी थी,
तुम कहाँ थे? और तुमने क्या किया था!
एक दिन इतिहास पूछेगा
कि तुमने जन्म गांधी को दिया था,
जिस समय अन्याय ने पशु-बल सुरा पी-

उग्र, उद्धत, दंभ-उन्मद-

एक निर्बल, निरपराध, निरीह को
था कुचल डाला
तुम कहां थे? और तुमने क्या किया था?
एक दिन इतिहास पूछेगा
कि तुमने जन्म गांधी को दिया था,
जिस समय अधिकार, शोषण, स्वार्थ
हो निर्लज्ज, हो नि:शंक, हो निर्द्वन्द्व
सद्य: जगे, संभले राष्ट्र में घुन-से लगे
जर्जर उसे करते रहे थे,

तुम कहाँ थे? और तुमने क्या किया था?
क्यों कि गांधी व्यर्थ
यदि मिलती न हिंसा को चुनौती,
क्यों कि गाँधी व्यर्थ
यदि अन्याय की ही जीत होती,
क्यों कि गांधी व्यर्थ
जाति स्वतंत्र होकर
यदि न अपने पाप धोती !

-हरिवंशराय बच्चन

तीनों बंदर बापू के

बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के!
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के!
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बंदर बापू के!
ग्यानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के!
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बंदर बापू के!
लीला के गिरधारी निकले तीनों बंदर बापू के!

सर्वोदय के नटवरलाल
फैला दुनिया भर में जाल
अभी जिएँगे ये सौ साल
ढाई घर घोड़े की चाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल

लंबी उमर मिली है, ख़ुश हैं तीनों बंदर बापू के
दिल की कली खिली है, ख़ुश हैं तीनों बंदर बापू के
बूढ़े हैं, फिर भी जवान हैं तीनों बंदर बापू के
परम चतुर हैं, अति सुजान हैं तीनों बंदर बापू के
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के
बापू को भी बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के

बच्चे होंगे मालामाल
ख़ूब गलेगी उनकी दाल
औरों की टपकेगी राल
इनकी मगर तनेगी पाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल

सेठों का हित साध रहे हैं तीनों बंदर बापू के
युग पर प्रवचन लाद रहे हैं तीनों बंदर बापू के
सत्य अहिंसा फाँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के
पूँछों से छवि आँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के
दल से ऊपर, दल के नीचे तीनों बंदर बापू के
मुस्काते हैं आँखें मीचे तीनों बंदर बापू के

छील रहे गीता की खाल
उपनिषदें हैं इनकी ढाल
उधर सजे मोती के थाल
इधर जमे सतजुगी दलाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल

मूँड़ रहे दुनिया-जहान को तीनों बंदर बापू के
चिढ़ा रहे हैं आसमान को तीनों बंदर बापू के
करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बंदर बापू के
बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बंदर बापू के
गांधी-छाप झूल डाले हैं तीनों बंदर बापू के
असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बंदर बापू के

दिल चटकीला, उजले बाल
नाप चुके हैं गगन विशाल
फूल गए हैं कैसे गाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल

हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के
कैसी हिकमत सिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के
प्रेम-पगे हैं, शहद-सने हैं तीनों बंदर बापू के
गुरुओं के भी गुरु बने हैं तीनों बंदर बापू के
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के!

नागार्जुन


How to Recite a Poem? (कविता कैसे बोलें?)

मंच पर कविता बोलना एक कला है। अगर आप 30 जनवरी को स्पीच या कविता बोलने जा रहे हैं, तो इन टिप्स का ध्यान रखें:

  1. आवाज़ में उतार-चढ़ाव (Voice Modulation): कविता को सपाट (Flat) न बोलें। जहाँ ‘जोश’ हो वहां आवाज़ तेज़ करें और जहाँ ‘दुःख’ हो वहां आवाज़ धीमी और भारी रखें।
  2. मुख्य शब्दों पर जोर: ‘सत्य’, ‘अहिंसा’, ‘आजादी’, ‘बलिदान’ जैसे भारी शब्दों पर थोड़ा रुककर (Pause लेकर) जोर दें।
  3. बॉडी लैंग्वेज (Body Language): सीधे खड़े रहें। हाथों का थोड़ा इस्तेमाल करें। सोहनलाल द्विवेदी जी की कविता बोलते समय मुट्ठी बांधकर जोश दिखाएं।
  4. शुरुआत और अंत:
    • शुरुआत: “आदरणीय प्रधानाचार्य जी, शिक्षकगण और मेरे प्यारे दोस्तों…”
    • अंत: “जय हिन्द! जय भारत!” के साथ अपनी बात खत्म करें।

Frequently Asked Questions (FAQ)

Q1: गांधी जी पर सबसे प्रसिद्ध कविता कौन सी है?

Ans: सोहनलाल द्विवेदी जी द्वारा रचित “चल पड़े जिधर दो डग मग में” गांधी जी पर लिखी गई सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय कविता है।

Q2: छोटे बच्चों (Class 1) के लिए कौन सी कविता अच्छी है?

Ans: “बापू भोले भाले थे, हम सबके रखवाले थे” – यह कविता छोटे बच्चों के लिए याद करने में बहुत आसान है।

Q3: 30 जनवरी को कौन सी कविता बोलनी चाहिए?

Ans: 30 जनवरी (शहीद दिवस) के लिए ऐसी कविता चुननी चाहिए जिसमें उनके त्याग, बलिदान और शहादत का जिक्र हो। जैसे- “गोलियों की गूंज में भी, राम नाम ही निकला था”।

Q4: गांधी जी के प्रिय भजन का नाम क्या है?

Ans: “वैष्णव जन तो तेने कहिए” और “रघुपति राघव राजा राम” उनके सबसे प्रिय भजन थे।


संबंधि‍त अर्टि‍कल

Movements of Mahatma Gandhi in Hindi : महात्मा गांधी के वो आंदोलन जिन्होंने दिलाई भारत को आजादीMahatma Gandhi Books in Hindi : महात्मा गांधी द्वारा लिखी गई प्रमुख किताबों के बारे में
Mahatma Gandhi’s Education in Hindi : जानिए महात्मा गांधी की प्रारंभिक शिक्षा से लेकर कॉलेज शिक्षा तक विस्तार सेQuiz on Mahatma Gandhi in Hindi : इस गांधी जयंती  पर हम जानेंगे कुछ महत्‍वपूर्ण सवालों के जवाब

महात्मा गांधी की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है जितनी आजादी के समय थी। ये Poems on Mahatma Gandhi केवल शब्दों का मेल नहीं हैं, बल्कि यह हमें याद दिलाती हैं कि एक दुबले-पतले इंसान ने अपनी आत्मशक्ति से दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य को झुका दिया था।

इस 30 जनवरी को, आइए हम इन कविताओं के माध्यम से बापू को सच्ची श्रद्धांजलि दें और उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें।

दोस्तों के साथ शेयर करें