हिंदी साहित्य के स्वर्णिम काल ‘भक्तिकाल’ (Bhakti Kal) की सगुण कृष्णभक्ति शाखा के सर्वोपरि महाकवि, अष्टछाप के जहाज और वात्सल्य रस के अप्रतिम सम्राट महाकवि सूरदास (1478–1583 ई.) भारतीय साहित्य के आकाश में देदीप्यमान सूर्य के समान हैं। उनके काव्य में भगवान श्री कृष्ण के बाल-रूप का जो स्वाभाविक, सूक्ष्म, मनोवैज्ञानिक एवं वात्सल्यपूर्ण चित्रण मिलता है, वैसा विश्व साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है।
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हिंदी साहित्य में महाकवि सूरदास के अद्वितीय स्थान को रेखांकित करते हुए यह प्रसिद्ध उक्ति सर्वविदित है:“सूर सूर तुलसी ससी, उडुगन केसवदास। अब के कबि खद्योत सम, जहँ-तहँ करत परकास॥”
(अर्थात: हिंदी साहित्य रूपी आकाश में सूरदास सूर्य के समान और तुलसीदास चंद्रमा के समान तेजस्वी हैं।)
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सूरदास की वात्सल्य रस निष्पत्ति पर विमुग्ध होकर लिखा है:”सूरदास वात्सल्य का कोना-कोना झांक आए हैं। इस क्षेत्र में कोई दूसरा कवि उनकी बराबरी नहीं कर सकता।”
प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC Hindi Sahitya, UPPSC, BPSC, UGC NET/JRF, UP TGT/PGT) तथा UP Board 10वीं/12वीं बोर्ड परीक्षाओं में सूरदास के जीवन वृत्त, जन्म स्थान विवाद (रुनकता बनाम सीही), गुरु वल्लभाचार्य, अष्टछाप की स्थापना, सूरसागर, भ्रमरगीत परंपरा, वात्सल्य व वियोग शृंगार तथा ब्रजभाषा की गेय शैली पर 3 से 5 प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं। नीचे सूरदास का संपूर्ण जीवन परिचय, साहित्यिक विशेषताएं, अमर रचनाएं, प्रमुख पद और 10 हल प्रश्न प्रस्तुत हैं।
महाकवि सूरदास: एक नज़र में (Executive Summary Table)
| विवरण पैरामीटर (Parameter) | प्रामाणिक ऐतिहासिक विवरण (Official Specifications) |
|---|---|
| पूरा नाम | महाकवि सूरदास (वात्सल्य रस सम्राट) |
| जन्म संवत् / सन् | संवत् 1535 (सन् 1478 ई.) वैशाख शुक्ल पंचमी |
| जन्म स्थान (विवाद एवं मत) | 1. रुनकता / रेणुका क्षेत्र (आगरा-मथुरा मार्ग) — अधिकांश विद्वानों का मत | 2. सीही ग्राम (दिल्ली के निकट) — डॉ. नगेंद्र व आधुनिक शोध |
| महाप्रयाण / देहावसान | संवत् 1640 (सन् 1583 ई.), पारसौली (मथुरा, गोवर्धन के निकट) |
| पिता का नाम | पंडित रामदास सारस्वत (गायक / सारस्वत ब्राह्मण) |
| दीक्षा गुरु | महाप्रभु वल्लभाचार्य जी (पुष्टिमार्ग के संस्थापक, शुद्धाद्वैत दर्शन) |
| साधना स्थली | गऊघाट (आगरा-मथुरा) एवं श्रीनाथ जी का मंदिर (गोवर्धन पर्वत) |
| साहित्यिक उपाधि | ‘अष्टछाप का जहाज’, ‘पुष्टिमार्ग का जहाज’, ‘खंजन नयन’, ‘वात्सल्य रस सम्राट’ |
| प्रमुख प्रामाणिक रचनाएं | सूरसागर (सवा लाख पद, उपलब्ध ~5000), सूरसारावली (1107 छंद), साहित्य लहरी (118 दृष्टकूट पद) |
| काव्य भाषा एवं शैली | साहित्यिक प्रौढ़ ब्रजभाषा, गेय पद शैली, मुक्तक काव्य, राग-रागिनी आधारित |
| प्रमुख रस | वात्सल्य रस (प्रधान), शृंगार रस (संयोग एवं वियोग), शांत रस |
| प्रमुख परीक्षा क्षेत्र | UP Board 10th & 12th, UPSC Hindi Sahitya, UGC NET, TGT/PGT, BPSC |
1. प्रारंभिक जीवन, जन्मांधता विवाद एवं दीक्षा (Early Life & Guru Deeksha)
(क) जन्म स्थान का ऐतिहासिक विवाद:
सूरदास के जन्म स्थान को लेकर विद्वानों में दो प्रमुख मत प्रचलित हैं:
- रुनकता (रेणुका क्षेत्र): ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ तथा आचार्य रामचंद्र शुक्ल, श्यामसुंदर दास आदि के अनुसार सूरदास का जन्म आगरा से मथुरा जाने वाले मार्ग पर स्थित ‘रुनकता’ (रेणुका क्षेत्र) नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
- सीही ग्राम (दिल्ली): आधुनिक शोधकर्ताओं, डॉ. नगेंद्र, गणपतिचंद्र गुप्त तथा कतिपय पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार सूरदास का जन्म दिल्ली के निकट फरीदाबाद स्थित ‘सीही’ नामक ग्राम में हुआ था।
(ख) क्या सूरदास जन्मांध थे? (Blindness Debate):
सूरदास जन्म से अंधे (जन्मांध) थे अथवा बाद में दृष्टिहीन हुए, यह हिंदी साहित्य का एक अत्यंत रोचक विवाद है:
- उनके पदों में कृष्ण के बाल-रूप, रंगों (पीतांबर, मोर मुकुट, नीलमणि देह), गो-चारण, यमुना तट और प्राकृतिक दृश्यों का जिस बारीकी और संजीवनी शक्ति से वर्णन हुआ है, उसे देखकर कई विद्वान (जैसे श्यामसुंदर दास, हजारी प्रसाद द्विवेदी) यह मानते हैं कि कोई जन्मांध व्यक्ति ऐसा सूक्ष्म वर्णन नहीं कर सकता। संभवतः वे वृद्धावस्था में दृष्टिहीन हुए होंगे।
- परन्तु ‘सूरसागर’ में स्वयं सूरदास ने लिखा है: “अंधे को सब कछु दरसाई” तथा “प्रभु मोहि दृष्टि विहीन कियो”। उनके अनुसार यह अंधापन शारीरिक से अधिक आध्यात्मिक वैराग्य का प्रतीक था, जिससे सांसारिक वासनाओं से मुक्ति मिल सके।
(ग) गऊघाट पर निवास और महाप्रभु वल्लभाचार्य से मिलन:
सूरदास आरंभ से ही विरक्त स्वभाव के थे। वे अपना घर छोड़कर आगरा और मथुरा के बीच यमुना तट पर स्थित ‘गऊघाट’ पर रहने लगे। वे पद बनाकर गाते थे और अपने शिष्यों के साथ रहते थे। उस समय वे दास्य और दीनता के भाव से पद रचते थे।
सन् 1509–10 ई. में पुष्टिमार्ग के संस्थापक महाप्रभु वल्लभाचार्य जी गऊघाट पधारे। सूरदास ने उन्हें अपना रचा हुआ दीनता का प्रसिद्ध पद सुनाया:“प्रभु हौं सब पतितन कौ टीको। और पतित सब दिवस चारि के, हौं तौ जनमत ही को॥”
वल्लभाचार्य जी ने सुनकर कहा:“सूर ह्वै कै ऐसो घिघियात काहे कौ है? कछु भगवद्-लीला को गान करौ।”
वल्लभाचार्य जी ने सूरदास को पुष्टिमार्ग में दीक्षित किया, श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कंधों की कथा और कृष्ण की लीलाओं का गूढ़ रहस्य समझाया। इसके बाद सूरदास की भक्ति दास्य भाव से परिवर्तित होकर सख्य, वात्सल्य और माधुर्य भाव में परिणत हो गई। वल्लभाचार्य जी उन्हें गोवर्धन स्थित ‘श्रीनाथ जी के मंदिर’ ले गए और वहाँ उन्हें कीर्तन-सेवा का प्रधान कार्यभार सौंप दिया।
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2. अष्टछाप के जहाज एवं महाप्रयाण (Ashtachhap & Dehvasan)
सन् 1565 ई. में वल्लभाचार्य जी के सुपुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ जी ने पुष्टिमार्ग के आठ सर्वश्रेष्ठ भक्त कवियों को मिलाकर ‘अष्टछाप’ की स्थापना की।
- अष्टछाप के 8 कवियों में 4 वल्लभाचार्य के शिष्य थे (कुंभनदास, सूरदास, परमानंददास, कृष्णदास) और 4 विट्ठलनाथ के शिष्य थे (गोविंदस्वामी, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास, नंददास)।
- सूरदास अष्टछाप के सर्वश्रेष्ठ, अग्रणी और सर्वाधिक प्रतिभाशाली कवि थे।
महाप्रयाण (सन् 1583 ई.):
संवत् 1640 (सन् 1583 ई.) में गोवर्धन के निकट पारसौली ग्राम में महाकवि सूरदास ने देहत्याग किया। उनके निधन के समय गोस्वामी विट्ठलनाथ जी ने अत्यंत भावुक होकर अश्रुपूरित नेत्रों से कहा था:“पुष्टिमार्ग को जहाज जात है, जाको कछु लेना होय सो लेउ।”
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3. सूरदास की प्रामाणिक रचनाएं (Literary Works)
नागरी प्रचारिणी सभा, काशी के अनुसार सूरदास के नाम से 25 ग्रंथ मिलते हैं, परन्तु ऐतिहासिक एवं साहित्यिक दृष्टि से केवल 3 रचनाएं ही सर्वमान्य और प्रामाणिक हैं:
- सूरसागर (Sur Sagar):
- यह सूरदास का कीर्ति-स्तंभ और हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है।
- यह श्रीमद्भागवत महापुराण के 12 स्कंधों पर आधारित सवा लाख पदों का विशाल संग्रह माना जाता है, जिसमें वर्तमान में लगभग 5,000 पद उपलब्ध हैं।
- इसका सर्वाधिक मार्मिक, दार्शनिक एवं कलात्मक अंश ‘भ्रमरगीत’ (दसवां स्कंध) है, जिसमें गोपियों के प्रेम के माध्यम से उद्धव के निर्गुण ज्ञान और योग साधना का मानमर्दन किया गया है।
- सूरसारावली (Sur Saravali):
- इसमें 1107 छंद हैं। इसे ‘सूरसागर’ का सार-तत्व या अनुक्रमणिका माना जाता है। इसमें संसार को ईश्वर का वृहद् खेल (लीला) माना गया है।
- साहित्य लहरी (Sahitya Lahari):
- यह 118 दृष्टकूट (कठिन प्रतीकात्मक) पदों का संग्रह है।
- इसमें अलंकार, नायिका-भेद और काव्य-रीति का शास्त्रीय विवेचन मिलता है। इसके अंतिम पद में सूरदास ने अपनी वंशावली का उल्लेख करते हुए स्वयं को चंदबरदाई का वंशज बताया है (यद्यपि यह प्रक्षिप्त माना जाता है)।
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4. काव्यगत विशेषताएं, रस एवं भाषा शैली (Poetic Style & Ras)
(क) भाव पक्ष (Emotional Core):
- वात्सल्य रस की त्रिवेणी: बाल मनोविज्ञान, बाल क्रीड़ाएं, रूठना, माखन चोरी, माता यशोदा का दुलार — इन सबका ऐसा सजीव चित्रण किया गया है कि पाठक मंत्रमुग्ध हो जाता है।
- उदाहरण: “मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी। कितनी बार मोहि दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी॥”
- शृंगार रस (संयोग व वियोग): राधा-कृष्ण का प्रथम मिलन, नयनों का वार्तालाप संयोग शृंगार का चरम है। वहीं भ्रमरगीत में गोपियों का विरह-ताप वियोग शृंगार का अप्रतिम उदाहरण है।
- उदाहरण: “निसिदिन बरसत नैन हमारे। सदा रहति पावस ऋतु हम पै, जब ते स्याम सिधारे॥”
- भ्रमरगीत में सगुण बनाम निर्गुण का द्वंद्व: गोपियां अपने सीधे, व्यंग्यात्मक और तार्किक वचनों से ज्ञानी उद्धव के शुष्क योग को परास्त कर देती हैं — “ऊधो, मन न भए दस बीस। एक हुतौ सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥”
(ख) कला पक्ष (Language & Craft):
- भाषा: सूरदास की भाषा विशुद्ध, प्रौढ़, ललित और माधुर्य गुण से युक्त साहित्यिक ब्रजभाषा है। उन्होंने लोक-प्रचलित ब्रजभाषा को शास्त्रीय गरिमा प्रदान की।
- शैली: राग-रागिनी पर आधारित गेय पद शैली (Lyric Poetry)। सूरदास स्वयं उच्च कोटि के संगीतकार थे, अतः उनके प्रत्येक पद में नाद-सौंदर्य और लयबद्धता है।
- अलंकार: उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टांत, यमक और अनुप्रास का सहज एवं स्वाभाविक प्रयोग (जैसे: “चरण कमल बंदौ हरिराई”).
5. सूरदास के अमर परीक्षोपयोगी पद एवं संदर्भ (Selected Master Verses)
| क्र. सं. | काव्यात्मक पद (Famous Verses) | प्रसंग एवं भावार्थ सार |
|---|---|---|
| 1 | चरण कमल बंदौ हरिराई। जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे को सब कछु दरसाई॥ | ईश्वर वंदना — प्रभु की कृपा से लंगड़ा पर्वत लांघ लेता है और अंधे को सब कुछ दिखाई देने लगता है। |
| 2 | जसोदा हरि पालने झुलावै। हलरावै दुलराइ मल्हावै, जोइ सोइ कछु गावै॥ | वात्सल्य रस — माता यशोदा बाल कृष्ण को पालने में झुलाती हुई वात्सल्य से लोरियां गाती हैं। |
| 3 | किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत। मनिमय कनक नंद कै आँगन, बिंब पकरिबै धावत॥ | बाल-लीला — मणि और सोने से जड़े आंगन में बाल कृष्ण अपने प्रतिबिंब को पकड़ने हेतु घुटनों के बल दौड़ते हैं। |
| 4 | मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ। मोसों कहत मोल को लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ॥ | बाल-हठ — बलराम (दाऊ) द्वारा चिढ़ाए जाने पर कन्हैया का माता यशोदा से रोषपूर्वक शिकायत करना। |
| 5 | मैया मैं नहिं माखन खायौ। ख्याल परै ये सखा सबै मिलि, मेरैं मुख लपटायौ॥ | माखन चोरी — बाल कृष्ण का मासूमियत से अपने सखाओं पर माखन लगाने का दोष मढ़ना। |
| 6 | ऊधो, मोहि ब्रज बिसरत नाहीं। हंससुता की सुंदर कगरी, अरु कुंजनि की छाहीं॥ | वियोग शृंगार — मथुरा में श्री कृष्ण का उद्धव से ब्रज, यमुना तट और कुंजों की स्मृतियों को साझा करना। |
| 7 | ऊधो, जोग जोग हम नाहीं। अति ही अहीन ग्यान जानी नहिं, कैसे ध्यान धराहीं॥ | भ्रमरगीत — गोपियों का उद्धव से कहना कि हम भोली गोपियां आपके इस कठोर योग के योग्य नहीं हैं। |
| 8 | निरगुन कौन देस कौ बासी? मधुकर हँसि समुझाय सौंह दै, बूझति सांच न हाँसी॥ | भ्रमरगीत — गोपियों द्वारा उद्धव के निर्गुण ब्रह्म के माता, पिता, कुल और रूप का उपहास उड़ाना। |
| 9 | अखियाँ हरि दरसन की भूखी। कैसे रहति रूप रस राची, ये बतियाँ सुनि रूखी॥ | विरह वेदना — कृष्ण दर्शन के बिना गोपियों की आंखों की तृष्णा और विरह का कारुणिक रुदन। |
| 10 | हमारे हरि हारिल की लकरी। मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी॥ | अनन्य निष्ठा — जैसे हारिल पक्षी लकड़ी को कभी नहीं छोड़ता, वैसे ही गोपियों ने कृष्ण को हृदय में दृढ़ता से बसाया है। |
6. विगत वर्षों की प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे गए 10 हल प्रश्न (Practice MCQs)
प्रश्न 1. ‘अष्टछाप का जहाज’ किस भक्त कवि को कहा जाता है? (UP Police SI 2021)
(A) तुलसीदास
(B) सूरदास
(C) कुंभनदास
(D) नंददास
उत्तर: (B) सूरदास
व्याख्या: सूरदास के देहावसान पर गोस्वामी विट्ठलनाथ जी ने कहा था — “पुष्टिमार्ग को जहाज जात है, जाको कछु लेना होय सो लेउ।”
प्रश्न 2. महाकवि सूरदास के आध्यात्मिक दीक्षा गुरु कौन थे? (UP Board / TGT Hindi)
(A) स्वामी रामानंद
(B) महाप्रभु वल्लभाचार्य
(C) नरहरिदास
(D) विट्ठलनाथ
उत्तर: (B) महाप्रभु वल्लभाचार्य
व्याख्या: गऊघाट पर महाप्रभु वल्लभाचार्य ने सूरदास को पुष्टिमार्ग की दीक्षा दी और भगवद्-लीला गान का उपदेश दिया।
प्रश्न 3. सूरदास की किस रचना में 118 दृष्टकूट (कठिन प्रतीकात्मक) पद संकलित हैं? (UGC NET Hindi)
(A) सूरसागर
(B) सूरसारावली
(C) साहित्य लहरी
(D) नल-दमयंती
उत्तर: (C) साहित्य लहरी
व्याख्या: साहित्य लहरी सूरदास का रीतिपरक ग्रंथ है, जिसमें 118 दृष्टकूट पदों में नायिका-भेद एवं अलंकारों का शास्त्रीय निरूपण है।
प्रश्न 4. ‘भ्रमरगीत’ प्रसंग सूरदास के किस मूल ग्रंथ का प्रमुख भाग है? (BPSC शिक्षक भर्ती)
(A) साहित्य लहरी
(B) सूरसारावली
(C) सूरसागर (दशम स्कंध)
(D) पदावली
उत्तर: (C) सूरसागर (दशम स्कंध)
व्याख्या: भ्रमरगीत श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध पर आधारित सूरसागर का सबसे सशक्त दार्शनिक अंश है, जिसमें सगुण भक्ति की विजय दिखाई गई है।
प्रश्न 5. आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार सूरदास का जन्म स्थान कहाँ माना जाता है? (UPSC CSAT / RO-ARO)
(A) सीही (दिल्ली)
(B) रुनकता / रेणुका क्षेत्र (आगरा-मथुरा मार्ग)
(C) मगहर
(D) पारसौली
उत्तर: (B) रुनकता / रेणुका क्षेत्र (आगरा-मथुरा मार्ग)
व्याख्या: आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा अधिकांश प्रामाणिक साहित्योतिहास ग्रंथों में सूरदास का जन्म रुनकता (रेणुका क्षेत्र) माना गया है।
प्रश्न 6. सूरदास किस रस के अप्रतिम सम्राट माने जाते हैं? (CTET / UP Constable)
(A) वीर रस
(B) हास्य रस
(C) वात्सल्य रस
(D) भयानक रस
उत्तर: (C) वात्सल्य रस
व्याख्या: बाल मनोविज्ञान और वात्सल्य रस के सूक्ष्म चित्रण में विश्व साहित्य में सूरदास की तुलना का कोई दूसरा कवि नहीं है।
प्रश्न 7. “सूर सूर तुलसी ससी, उडुगन केसवदास” पंक्ति में कौन सा अलंकार है? (UP TGT)
(A) यमक अलंकार
(B) रूपक अलंकार
(C) श्लेष अलंकार
(D) उत्प्रेक्षा अलंकार
उत्तर: (A) यमक अलंकार
व्याख्या: यहाँ ‘सूर’ शब्द दो बार आया है — पहले सूर का अर्थ ‘सूरदास’ और दूसरे सूर का अर्थ ‘सूर्य’ (Sun) है।
प्रश्न 8. सूरदास की काव्य भाषा मुख्य रूप से कौन सी है? (UP Board Class 10 & 12)
(A) अवधी
(B) साहित्यिक ब्रजभाषा
(C) खड़ी बोली
(D) मैथिली
उत्तर: (B) साहित्यिक ब्रजभाषा
व्याख्या: सूरदास ने अपने संपूर्ण काव्य की रचना अत्यंत माधुर्यपूर्ण, प्रौढ़ और सरस साहित्यिक ब्रजभाषा में की है।
प्रश्न 9. कथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए: (UPSC Pattern)
- कथन (A): भ्रमरगीत में गोपियों के माध्यम से ज्ञान और योग पर प्रेम और भक्ति की विजय स्थापित की गई है।
- कारण (R): उद्धव मथुरा से निर्गुण ज्ञान और अष्टांग योग का उपदेश लेकर आए थे, परन्तु गोपियों के अनन्य प्रेम के आगे वे स्वयं परास्त हो गए।
(A) (A) और (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है।
(B) (A) और (R) दोनों सही हैं किन्तु (R), (A) सही व्याख्या नहीं है।
(C) (A) सही है परन्तु (R) गलत है।
(D) (A) गलत है परन्तु (R) सही है।
उत्तर: (A) (A) और (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है।
प्रश्न 10. सूरदास का महाप्रयाण (देहावसान) किस ग्राम में हुआ था? (UPPSC Staff Nurse / TGT)
(A) रुनकता
(B) सीही
(C) पारसौली (गोवर्धन)
(D) बरसाना
उत्तर: (C) पारसौली (गोवर्धन)
व्याख्या: संवत् 1640 (सन् 1583 ई.) में गोवर्धन की तलहटी में स्थित पारसौली ग्राम में सूरदास ने देहत्याग किया था।
7. सूर साहित्य एवं कृष्ण काव्य हेतु अनुशंसित प्रामाणिक पुस्तकें (Recommended Books)
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|---|---|---|---|
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8. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1. सूरदास को ‘अष्टछाप का जहाज’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर: गोस्वामी विट्ठलनाथ द्वारा स्थापित अष्टछाप (8 कृष्णभक्त कवियों का समूह) में सूरदास सर्वाधिक प्रतिभाशाली, संगीत-विशारद और पुष्टिमार्गीय भक्ति के अग्रणी कवि थे। उनके देहावसान पर विट्ठलनाथ जी ने उन्हें पुष्टिमार्ग का जहाज कहा था।
प्रश्न 2. सूरदास के जन्म स्थान को लेकर क्या मतभेद है?
उत्तर: प्राचीन परंपरा (चौरासी वैष्णवन की वार्ता) और आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार उनका जन्म आगरा-मथुरा मार्ग स्थित ‘रुनकता’ में हुआ था, जबकि आधुनिक शोधकर्ताओं (डॉ. नगेंद्र आदि) के अनुसार उनका जन्म दिल्ली के पास ‘सीही’ ग्राम में हुआ था।
प्रश्न 3. भ्रमरगीत का मुख्य प्रतिपाद्य विषय क्या है?
उत्तर: भ्रमरगीत का मुख्य उद्देश्य ज्ञान और योग (उद्धव) की तुलना में प्रेम और भक्ति (गोपियों) की श्रेष्ठता सिद्ध करना है। यह सगुण भक्ति की निर्गुण पर विजय का अमर आख्यान है।
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